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बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में बाघों की लाशों पर आंकड़ों का पहरा: 5 मौतों के 'पाप' को छुपाने के लिए 'सस्ती शोहरत' के खेल पर गहराया संदेह

 



बठान एंक्लोजर से रहस्यमय लापता शावक को ढूंढने के बजाय 'पॉजिटिविटी' का प्रोपेगेंडा फैलाने के आरोप;


आंकड़ों की आड़ में कत्लेआम मैनेज करने की चर्चा,बढ़े आंकड़ों से नहीं धुलेंगे अधिकारियों के 'पाप'; 5 बाघों की मौत और लापता शावक पर 'पर्दा डालने की कोशिश' सवालों के घेरे में


बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में मची लूट-खसोट और कत्लेआम के बीच प्रबंधन की कार्यप्रणाली अब गहरे सवालों के घेरे में है। जनवरी के महज 22 दिनों में 5 बाघों की संदिग्ध मौत और अति-सुरक्षित बथान बाड़े (एंक्लोजर) से एक मासूम शावक का 'रहस्यमयी गायब' होना वह कड़वा सच है जिससे प्रबंधन बच नहीं सकता। बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि प्रबंधन इन लापता शावकों को जंगल में ढूंढने के बजाय पूरे मामले को 'मैनेज' करने और फर्जी पॉजिटिविटी फैलाने में जुटा है। अभी तक गणना के आधिकारिक आंकड़े खुले भी नहीं हैं, फिर भी जिस तरह 'संख्या बढ़ने' का ढोल पीटा जा रहा है, उससे यह संदेह गहराता है कि यह डैमेज कंट्रोल की एक सोची-समझी कोशिश है।



गजेन्द्र परिहार की विशेष रिपोर्ट 

शहडोल /उमरिया : यह तो पूरी तरह स्पष्ट है कि आगामी गणना में बाघों के आंकड़ों में इजाफा होना तय है, क्योंकि बीते वर्ष में कई शावकों ने जन्म लिया है और यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि प्रबंधन इसी प्राकृतिक बढ़त को 'ढाल' बनाकर अपनी नाकामियों को छिपाने का प्रयास कर रहा है। हकीकत तो यह है कि बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व अब बाघों की सुरक्षा का नहीं बल्कि उनके अंत का गवाह बनता दिख रहा है। बीते दिनों बेल्दी गाँव में बाघ पर सरेआम लाठी-डंडे और पत्थर बरसे जिसका वीडियो वायरल हुआ। इस शर्मनाक घटना के वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हैं, जो सुरक्षा के दावों की पोल खोलते हैं। वहीं जनवरी के शुरुआती 22 दिनों के भीतर ही 5 बाघों की जान चली गई। हद तो तब हो गई जब सुरक्षित बथान एंक्लोजर से नन्हें शावक को संदिग्ध रूप से गायब कर दिया गया। क्या प्रबंधन की संवेदनहीनता इतनी बढ़ गई है कि लापता शावक को खोजने के बजाय, पूरा महकमा इस मामले को दबाने और ऊपर तक 'मैनेज' करने में जुटा हुआ है? आशंका जताई जा रही है कि अपनी इन तमाम संगीन लापरवाहियों को छिपाने के लिए प्रबंधन अब 'आगामी गणना' के आंकड़ों को एक सुरक्षा कवच की तरह इस्तेमाल कर रहा है।





पीके वर्मा की जांच और 'बड़े साहब' की भूमिका पर उठते सवाल

पूरे मामले में एक नया और चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब डिप्टी डायरेक्टर पीके वर्मा, जिनका स्थानांतरण कान्हा टाइगर रिजर्व के लिए हो चुका है, उनकी शिकायतों और उच्च स्तरीय जांचों को लेकर चर्चाएं तेज हो गईं। गलियारों में चर्चा है कि पीके वर्मा के खास बताए जाने वाले 'बड़े साहब' अब पूरी ताकत झोंक रहे हैं ताकि पुरानी कारगुजारियां उजागर न हो सकें और नए फील्ड डायरेक्टर पर भी दबाव बनाने की बातें सामने आ रही हैं। यहाँ यह कहावत सटीक बैठती है कि 'दूसरे की लंगोटी बचाने के चक्कर में कभी-कभी खुद की बीच बाजार में उतर जाती है', शायद साहब यह भूल गए हैं। जांच की आंच से बचाने का यह खेल अब सवालों के घेरे में है।





सकारात्मक कार्यों की आड़ में कत्लेआम छिपाने की साजिश?

प्रबंधन की मंशा पर सवाल तब और गहरे हो गए जब बाघों की मौतों के बड़े मामलों के बीच अचानक बारहसिंगा की बढ़ती आबादी और बायसन प्रवास जैसे मामलों को तूल दिया जाने लगा। हालांकि बारहसिंगा और बायसन का संरक्षण एक सकारात्मक प्रयास है, लेकिन जानकारों का मानना है कि इन खबरों को जानबूझकर इस समय हवा दी जा रही है ताकि बाघों के कत्लेआम, गायब शावक और पुराने अधिकारियों के खिलाफ चल रही जांचों से ध्यान भटकाया जा सके। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रबंधन चाहता है कि जनता और मीडिया इन 'पॉजिटिव पब्लिसिटी' वाली खबरों में उलझ जाए और 5 बाघों की मौत का हिसाब मांगना भूल जाए।

विस्थापितों के हक पर डाका और दिल्ली तक शिकायतों का अंबार

बांधवगढ़ प्रबंधन की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होतीं; गाइड भर्ती के नाम पर वर्षों से संघर्ष कर रहे स्थानीय विस्थापितों के हक पर डाका डालने के आरोपों से जनता में भारी आक्रोश है। भ्रष्टाचार और कुव्यवस्था की ये शिकायतें भोपाल से लेकर दिल्ली तक पहुँची हैं, जिसके बाद कई जांच समितियां भी गठित की गईं। आरोप है कि इन जांचों के नतीजों को दबाने और अपनी कुर्सी बचाने के लिए ही 'सस्ती शोहरत' का सहारा लिया जा रहा है। पार्क के भीतर जो शिकार और भ्रष्टाचार का खेल चल रहा है, उससे ध्यान भटकाने के लिए अब प्रोपेगेंडा का सहारा लिए जाने की चर्चा जोरों पर है।

पाप छिपाने के लिए आंकड़ों का अनुचित इस्तेमाल

सवाल यही है कि क्या केवल कागज पर बढ़े हुए आंकड़े दिखा देने से अधिकारियों के पाप धुल जाएंगे? क्या बेल्डी गाँव में बाघों पर बरसे लाठी-डंडों के निशान इन सरकारी आंकड़ों के पीछे छिप जाएंगे? बांधवगढ़ की समृद्ध विरासत को अपनी कुव्यवस्था से बर्बाद करने वाले अधिकारी आज संख्या की आड़ ले रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि 5 बाघों की मौत और लापता शावकों का हिसाब आंकड़ों की किसी भी बाजीगरी से नहीं दिया जा सकता। लापता शावकों को ढूंढने में नाकाम प्रबंधन अब प्रोपेगेंडा से अपनी छवि चमकाने की कोशिश करता दिख रहा है, जिसे जागरूक मीडिया और जनता बखूबी समझ रही है।

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