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एसवी सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल या महज रेफरल सेंटर.. क्या है हकीकत?


कार्डियक स्पेशलिस्ट डॉ त्रिपाठी का बयान- 'मैं रोज नहीं बैठता, भाई का अस्पताल है', तो बिना पूर्णकालिक विशेषज्ञों के 'सुपर स्पेशलिटी' कैसे?

विज्ञापनों के भ्रम का घातक परिणाम: हृदय रोग जैसी गंभीर स्थिति में भटकेगा मरीज, तो कीमती समय की बर्बादी का जिम्मेदार कौन?


निलंबित हो चुके डॉक्टर शिवेंद्र सिंह तिवारी के पेशेवर अतीत पर विज्ञापनों का पर्दा। 

गजेंद्र परिहार : कोबरा न्यूज 

शहडोल। विंध्य क्षेत्र के मरीजों को महानगरों की तर्ज पर स्वास्थ्य सुविधाएं देने के दावे के साथ आज एसवी सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल का शुभारंभ हुआ। भिलाई, रायपुर, जबलपुर और कोलकाता के विशेषज्ञों के नाम का बैनर लगाकर जो माहौल बनाया गया है, सार्वजनिक पटल पर उपलब्ध जानकारी उससे अलग ही तस्वीर पेश कर रही है। जिन विशेषज्ञों की ओपीडी का प्रचार किया जा रहा है, उनमें से कई का शहडोल में नियमित बैठना ही तय नहीं है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि बाहरी और विजिटिंग डॉक्टरों के भरोसे किसी अस्पताल को 'सुपर स्पेशलिटी' का दर्जा कैसे दिया जा सकता है?



ओपीडी और सुपर स्पेशलिटी के दावों पर सवाल

अस्पताल के विज्ञापन में कार्डियक स्पेशलिस्ट डॉक्टर गौरव त्रिपाठी का नाम प्रमुखता से छापा गया है। दी गई जानकारी के अनुसार, स्वयं डॉ. त्रिपाठी ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया है कि उनका शहडोल में बैठने का कोई नियमित शेड्यूल नहीं है। उनका कहना है कि यह उनके परिचित या भाई का अस्पताल है, इसलिए उनका नाम दर्ज है और वे महीने में एकाध बार या बुलावे पर ही आएंगे। सार्वजनिक रिकॉर्ड के मुताबिक वे रायपुर के अस्पतालों में अपनी सेवाएं देते हैं। ऐसे में सबसे बड़ा तार्किक सवाल यह है कि यदि सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टर महीने में महज एक दिन आएंगे, तो बिना इन-हाउस पूर्णकालिक विशेषज्ञों के यह अस्पताल 'सुपर स्पेशलिटी' के मानकों को कैसे पूरा करता है?



विज्ञापनों के भ्रम का घातक परिणाम

इन भ्रामक विज्ञापनों का सबसे खौफनाक पहलू मरीजों की जान के साथ जुड़ा है। जब कोई आम आदमी विज्ञापन में पढ़ता है कि मशहूर कार्डियक स्पेशलिस्ट डॉक्टर गौरव त्रिपाठी अब शहडोल के एसवी अस्पताल में उपलब्ध हैं, तो हृदय रोग (कार्डियक समस्या) जैसी गंभीर आपातकालीन स्थिति में वह अपने मरीज की जान बचाने की आस में इसी अस्पताल की ओर भागता है। लेकिन वहां पहुंचने पर जब वह विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं मिलता, तो मरीज के इलाज के शुरुआती और सबसे महत्वपूर्ण घंटे पूरी तरह बर्बाद हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में यह आशंका बनी रहती है कि विशेषज्ञ की अनुपस्थिति में बिना पर्याप्त अनुभव वाले चिकित्सक इलाज का प्रयास करें, जिससे मरीज के स्वास्थ्य में और भारी गिरावट आ सकती है। अंततः कुछ घंटे बर्बाद करने के बाद अस्पताल केवल एक रेफरल प्रक्रिया निभाते हुए मरीज को वापस बड़े शहरों की ओर रेफर कर देता है। इस तरह के प्रचार से सीधे तौर पर मरीजों की जान जोखिम में पड़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।



सार्वजनिक पटल पर अतीत की जानकारी

मरीजों के इलाज और विश्वास से जुड़ा एक और मामला यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर शिवेंद्र सिंह तिवारी का है। विज्ञापनों में उन्हें अनुभवी बताकर पेश किया जा रहा है, लेकिन सार्वजनिक जानकारी के अनुसार, मई दो हजार पच्चीस में भिलाई के एक मेडिकल इंस्टिट्यूट ने कथित तौर पर निलंबित हो चुके डॉक्टर शिवेंद्र सिंह तिवारी पर कार्रवाई की थी। उपलब्ध रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन पर आरोप था कि उन्होंने अपनी प्रैक्टिस के प्रचार के लिए एक बयान का इस्तेमाल किया था, जिसे अनुचित मानते हुए मेडिकल काउंसिल ने भी संज्ञान लिया था। मेडिकल एथिक्स से जुड़े इस अतीत को विज्ञापनों में स्पष्ट न करना अस्पताल की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करता है। इनकी सेवाएं भी मुख्य रूप से रायपुर और भिलाई में ही दर्ज बताई जाती हैं।

महानगरों के विशेषज्ञों की हकीकत

प्राप्त जानकारी के अनुसार, डॉ. विवेक शर्मा शहडोल में नियमित सेवाएं दे रहे हैं, लेकिन विज्ञापन में छपे अन्य कई नामों की स्थिति स्पष्ट नहीं है। स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े सार्वजनिक रिकॉर्ड्स खंगालने पर पता चलता है कि डॉ. अंबुज सोनी की पदस्थापना मुख्य रूप से जबलपुर और बिलासपुर के अस्पतालों में दर्ज है। इसी तरह पेन मैनेजमेंट विशेषज्ञ डॉ. अजिता तिवारी का नाम कोलकाता के चिकित्सा संस्थानों से जुड़ा हुआ है। ऐसे में यह सवाल विचारणीय है कि जो चिकित्सक मूल रूप से अन्य शहरों के अस्पतालों में पूर्णकालिक सेवाएं दे रहे हैं, वे शहडोल में नियमित मरीजों का परीक्षण कैसे करेंगे और उनके नाम पर वसूले जाने वाले पेमेंट का क्या औचित्य है?

जिम्मेदारों ने साधी चुप्पी

इस पूरे मामले, अस्पताल के दावों की वास्तविकता और सुपर स्पेशलिटी के मापदंडों को जानने के लिए मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. राजेश मिश्रा को उनके दूरभाष पर संपर्क किया गया, लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया। इसी प्रकार से, समाचार में पूर्ण संतुलन बनाए रखने और अस्पताल का पक्ष जानने के लिए एसवी अस्पताल के डॉ. शिवेंद्र सिंह तिवारी और डॉ. विवेक शर्मा से भी संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनका भी फोन नहीं उठा। जिम्मेदारों की यह चुप्पी कई सवालों को जन्म देती है, जिसका जवाब स्वास्थ्य विभाग और अस्पताल प्रबंधन को सार्वजनिक करना चाहिए।

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