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बाघ के हमले से महिला की मौत,ग्रामीणों के हमले से वनकर्मी घायल और फिर रेस्क्यू के दौरान बाघ की मौत





क्या 'टाइगर स्टेट' मध्य प्रदेश को बाघ विहीन करने के बाद ही नींद में सो रहे भ्रष्ट तंत्र पर कार्यवाही करेंगे सीएम??



बांधवगढ़ में 'हत्या' का सरकारी खेल: बाघ के हमले में महिला की मौत, खून से लाल हुआ वन प्रबंधन

 प्रतिष्ठा या साजिशन हत्या? वन अमले के कथित ओवरडोज से बाघ ने आर्किटेक्चर दम, लीपापोती में इलेक्ट्रानिक पूरा महकमा


 कुप्रबंधन पर मेहरबान बैठे आका: डॉ. समीता राजौरा और शुभ रंजन सेन की खामोशी से पनप रहा भ्रष्टाचार का सिंडिकेट

 


इंट्रो: विश्व विख्यात बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व इन दिनों कथित तौर पर 'सरकारी कब्रगाह' में तब्दील होता नजर आ रहा है, जहां न इंसान सुरक्षित बताए जा रहे हैं और न ही बाघ। एक ओर बेकाबू बाघों के हमलों से ग्रामीण अकाल मौत के शिकार हो रहे हैं, तो दूसरी ओर रेस्क्यू के नाम पर वन अमले की कार्यप्रणाली पर गंभीर उंगलियां उठ रही हैं। ट्रैंक्विलाइज़ेशन के दौरान बाघ की संदिग्ध मौत ने इस तंत्र की कार्यशैली पर वीभत्स सवाल खड़े कर दिए हैं। सूत्रों की मानें तो यह महज एक हादसा नहीं, बल्कि प्रबंधन की कथित नाकामी को छिपाने की एक गहरी साजिश हो सकती है। जन चर्चा है कि आलाकमान इस कुप्रबंधन से पूरी तरह वाकिफ होने के बाद भी मौन है, और पूरा तंत्र इस मामले पर पर्दा डालने की कोशिश में जुटा हुआ प्रतीत हो रहा है।

शहडोल: उमरिया जिले का बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व इन दिनों प्रशासनिक विफलता और खून-खराबे का नया केंद्र बनता नजर आ रहा है। पनपथा बफर क्षेत्र के खोरबा टोला में शनिवार रात आंगन में सो रही 48 वर्षीय फूलबाई को बाघ ने अपना निशाना बनाया, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई। इस हृदयविदारक घटना के बाद वन विभाग के खिलाफ ग्रामीणों का गुस्सा ज्वालामुखी बनकर फूटा। आक्रोशित भीड़ ने न सिर्फ रिजर्व की टीम को खदेड़ा, बल्कि कथित तौर पर रेंजर का सिर फोड़कर अपनी सुरक्षा न होने का कड़ा विरोध दर्ज कराया। लेकिन इसके बाद वन अमले द्वारा अपनी कथित नाकामी छिपाने के लिए उठाए गए कदमों ने पूरी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

मई का खूनी कैलेंडर: लगातार मौतें और अमले की कथित कुंभकर्णी नींद

बांधवगढ़ में यह संघर्ष अचानक नहीं हुआ, बल्कि मई का पूरा महीना इलाका खौफ के साए में रहा है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, 3 मई को पनपथा कोर में रज्जू कोल (46) की बाघ के हमले में मौत हुई, 10 मई को धमोखर में भालू ने मीरा सिंह को जख्मी किया, 11 को मानपुर में निरसिया बैगा और 12 मई को धर्मेंद्र बाघ के जानलेवा हमले का शिकार हुए। इसके बाद 16 मई को फूलबाई को बाघ ने मार डाला। एक ही महीने में लगातार इतने हमलों और मौतों के बावजूद बांधवगढ़ प्रबंधन द्वारा ठोस कदम न उठाए जाने पर स्थानीय स्तर पर घोर संवेदनहीनता और अकर्मण्यता के आरोप लग रहे हैं।

रेस्क्यू के नाम पर बाघ को कथित तौर पर दी गई मौत की नींद

ग्रामीणों के हंगामे से बचने और अपनी कथित विफलता को दबाने के लिए वन विभाग ने आनन-फानन में जो रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया, वह खुद एक बड़े विवाद में घिर गया है। जन चर्चाओं और विश्वस्त सूत्रों के अनुसार, अनुभवहीन टीम द्वारा ट्रैंक्विलाइज़ करने के दौरान दवा का हैवी ओवरडोज दिया गया, जिससे तड़प कर बाघ ने दम तोड़ दिया। पर्यावरण प्रेमियों द्वारा इसे एक राष्ट्रीय धरोहर की 'प्रशासनिक हत्या' करार दिया जा रहा है। फील्ड डायरेक्टर डॉ. अनुपम सहाय और उनकी टीम का यह 'रेस्क्यू ऑपरेशन' उनके तकनीकी दिवालियेपन का सुबूत माना जा रहा है, जिसकी उच्च स्तरीय जांच की मांग उठ रही है।

कुप्रबंधन पर शीर्ष अधिकारियों की रहस्यमयी खामोशी के मायने

आखिर बांधवगढ़ के इस जानलेवा कुप्रबंधन पर आला अधिकारी चुप्पी क्यों साधे हुए हैं? पीसीसीएफ वाइल्डलाइफ डॉ. समीता राजौरा और पीसीसीएफ शुभ रंजन सेन की रहस्यमयी खामोशी पर कई तीखे सवाल उठ रहे हैं। जब फील्ड पर इंसान और बाघ दोनों की जान जा रही है, तब भोपाल में बैठे इन अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध नजर आती है। सूत्रों और जन चर्चाओं की मानें तो नीचे से लेकर ऊपर तक सिस्टम की जड़ें इतनी उलझी हुई हैं कि इन अधिकारियों ने कथित तौर पर जमीनी विफलताओं को खुला संरक्षण दे रखा है, जिससे पूरी वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था ही सवालों के घेरे में आ गई है।

भ्रष्टाचार का कथित किला और फाइलों में दफ्न होती जांचें

बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व लंबे समय से वित्तीय अनियमितताओं और कथित कमीशनखोरी के आरोपों से घिरा रहा है। सूत्रों की मानें तो यहां आरटीआई के तहत महत्वपूर्ण जानकारियां छुपाना और एसआईटी तथा सीआईसी की गंभीर जांचों को फाइलों में दफन कर देना प्रबंधन की कार्यशैली का हिस्सा बन चुका है। बाघों की मौत हो या विकास कार्यों के नाम पर करोड़ों का वारा-न्यारा, हर मामले को कथित तौर पर रफा-दफा करने के प्रयास होते रहे हैं। जन चर्चा है कि इसी कथित नेक्सस ने बांधवगढ़ को उस मुहाने पर ला खड़ा किया है, जहां अब केवल मौतों का तांडव चल रहा है।

मुआवजे की आड़ में छिपती व्यवस्था की गंभीर नाकामियां

इस त्रासदी के बीच प्रदेश के मुखिया मोहन यादव द्वारा 25 लाख के मुआवजे की घोषणा को स्थानीय लोग महज़ एक राजनीतिक मरहम और अपनी विफलता छुपाने की कोशिश मान रहे हैं। सवाल यह उठाया जा रहा है कि क्या सरकार चंद रुपयों से मृतका की जान और उस बेजुबान बाघ की मौत की भरपाई कर सकती है, जिसकी जान कथित तौर पर वन विभाग के नकारेपन के कारण गई? जानकार मान रहे हैं कि जब तक बांधवगढ़ के जिम्मेदार अधिकारियों और भोपाल में बैठे उनके आकाओं की जवाबदेही तय नहीं होती, तब तक ऐसे मुआवजे सिर्फ लीपापोती साबित होंगे। जनहित में इस पूरे मामले की तत्काल निष्पक्ष उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए।

इनका कहना है

ओवरडोज का मामला नहीं लगता, अभी बाघ की मौत का कारण बता बना मुश्किल है, पोस्टमार्टम हो जाए उसके रिपोर्ट के आधार पर कुछ कहना उचित होगा।

डॉ अनुपम सहाय

फील्ड डायरेक्टर, बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व

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