शिकारियों का शिकार हुआ य जिम्मेदारो ने बेच दिया... विभाग से नहीं हो रहा तो पुलिस से कराई जाए जांच... एंक्लोजर से कैसे लुप्त हो गया शावक
आत्महत्या दुष्प्रेरण और उत्पीड़न के आरोपी अफसरो को सौंपी गई थी बाघ शावक की सुरक्षा और देखरेख
क्षेत्र संचालक संचालन में साबित हो रहे असफल... बाघ सुरक्षा पर बड़ी सेन्ध
शहडोल/उमरिया। बांधवगढ़ का बठान एंक्लोजर अब एक अनाथ शावक की ‘मौत की पहेली’ बन चुका है, जहाँ 150 घंटे बाद भी 8 माह के मासूम का सुराग न मिलना प्रबंधन की नीयत और सुरक्षा दावों पर कालिख पोत रहा है। 16 फीट ऊँची फेंसिंग लांघने के हास्यास्पद ‘मायाजाल’ के पीछे असल सच यह है कि सुरक्षा की कमान उन दागी अफसरों के हाथों में थी जो खुद अपने ही कर्मचारी को आत्महत्या के लिए उकसाने के संगीन आरोपों से घिरे हैं। शिकारियों की सक्रियता और अंगों की तस्करी के बीच मासूम का गायब होना किसी खूनी सांठगांठ की ओर इशारा कर रहा है, जबकि जिम्मेदार अधिकारी अब स्थानांतरण की आड़ में जवाबदेही से पल्ला झाड़ने की जुगत में हैं। आखिर किसके संरक्षण में बांधवगढ़ के इस गौरव को ‘ठिकाने’ लगा दिया गया?
घटनाक्रम और 16 फीट का मायाजाल
यह वही बदनसीब शावक है जिसे कुछ समय पूर्व सलखनिया बीट में एक गिरे हुए पेड़ की खोह (हॉलो) से बेहद सुरक्षित तरीके से रेस्क्यू किया गया था। प्रबंधन ने अपनी लापरवाही छिपाने के लिए अब 16 फीट (5 मीटर) ऊंची फेंसिंग का ऐसा ‘मायाजाल’ बुना है जिसे सुनकर कोई भी सर पकड़ ले। दावा किया जा रहा है कि 8 माह का यह नन्हा शावक इतनी ऊंची दीवार लांघकर भाग गया। सवाल यह है कि क्या यह संभव है कि जो मासूम अभी खुद शिकार करना भी नहीं सीखा, वो 16 फीट की फेंसिंग फांद गया? सच्चाई यह है कि दागी अफसरों की सुस्त निगरानी ने या तो उसे शिकारियों के हवाले कर दिया या फिर वह इलाके में सक्रिय खूंखार सोन कुत्तों का निवाला बन गया।
दागी अफसर और असुरक्षित सिस्टम
सबसे बड़ा सवाल बांधवगढ़ के आला प्रबंधन पर उठता है कि आखिर विवादित अधिकारियों को इतनी संवेदनशील जिम्मेदारी दी ही क्यों गई? ताला रेंजर राहुल किरार और एसडीओ दिलीप मराठा के राज में जब उनके अपने ही कर्मचारी सुरक्षित नहीं हैं, तो एक अनाथ शावक कैसे सुरक्षित रह सकता है? ये वही अधिकारी हैं जिनकी प्रताड़ना से तंग आकर उनके मातहत डिप्टी रेंजर लल्लू राम दीक्षित को जंगल के कुएं में कूदकर जान देने की कोशिश करनी पड़ी थी। जिस तंत्र में कर्मचारी मानसिक उत्पीड़न झेलकर मौत चुनने पर मजबूर हो जाएं, वहां बेजुबान की सुरक्षा की उम्मीद बेमानी है। आत्महत्या दुष्प्रेरण का मामला झेल रहे इन ‘दागी’ चेहरों को कमान सौंपना क्या किसी बड़ी ‘साजिश’ या ‘अंधेरगर्दी’ का हिस्सा है?
शिकार या खूनी सांठगांठ
बाघों के अंगों और खाल की तस्करी का काला इतिहास बांधवगढ़ में फिर से जिंदा हो गया है। हाल ही में शिकार और अवशेषों की तस्करी के कई मामले सामने आए हैं, जिससे स्पष्ट है कि पार्क के भीतर शिकारियों का गिरोह बेखौफ घूम रहा है। बठान की यह घटना पहली नहीं है; इससे पूर्व खतौली की मादा बाघिन का चौथा शावक भी महीनों से लापता है, जिसे प्रबंधन ने बड़ी चालाकी से ठंडे बस्ते में दबा दिया। वह मादा अब केवल तीन शावकों के साथ ही नजर आती है, लेकिन चौथे का क्या हुआ? यह सवाल आज भी अनुत्तरित है। क्या बठान के एंक्लोजर तक शिकारियों की पहुंच दागी अफसरों की मिलीभगत से हुई? 150 घंटे बाद भी सुराग न मिलना इस गहरी साजिश और खूनी सांठगांठ की गवाही दे रहा है।
स्थानांतरण और जिम्मेदारी से पलायन
चर्चा है कि डिप्टी डायरेक्टर का तबादला कान्हा टाइगर रिजर्व के लिए हो चुका है। लेकिन सवाल यह है कि क्या नए स्थान पर जाने मात्र से इस घोर लापरवाही और षड्यंत्र में उनकी भूमिका खत्म हो जाएगी? क्या इस संदिग्ध मामले के लिए उनकी जिम्मेदारी तय नहीं की जाएगी? वहीं, फील्ड डायरेक्टर अनुपम सहाय, जिनकी प्राथमिक जिम्मेदारी बाघों की सुरक्षा है, वे अपनी जवाबदेही से कैसे बच सकते हैं? क्या उन पर कार्रवाई की गाज गिरेगी या विभाग के उच्च अधिकारी इस मामले पर भी लीपापोती कर अपनी ‘मोहर’ लगा देंगे? बठान का यह लापता शावक अब सीधे तौर पर आला अधिकारियों की कार्यशैली को कठघरे में खड़ा कर रहा है।
इनका कहना है
‘‘लापता बाघ शावक की लगातार पतासाजी की जा रही है। टीम को लगाकर आसपास के क्षेत्र की गहन छानबीन जारी है, हालांकि अब तक शावक का कोई सुराग नहीं मिला है। वहीं खतौली की ‘रा’ बाघिन के चौथे शावक के संबंध में भी कोई जानकारी नहीं है, बाघिन आमतौर पर केवल तीन शावकों के साथ ही नजर आती है।’’
डॉ. अनुपम सहाय
फील्ड डायरेक्टर, बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व, उमरिया

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