बांधवगढ़ में नियमों का जनाजा: विस्थापित ताकते रह गए और 'इंद्रपाल' जैसे रसूखदार बनेंगे गाइड? शावक लापता, साहब मगन और 'मनीष' की वसूली चरम पर!
सुरक्षित इनक्लोजर से लापता शावक को ढूंढने के स्थान पर गाइड भर्ती के नाम पर रसूखदारों की भर्ती का खेल जारी !! अपना उल्लू सीधा कर रहें अधिकारी
शहडोल/उमरिया। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व प्रबंधन ने यह साबित कर दिया है कि उसे न तो नियमों की परवाह है और न ही नैतिकता की। करीब 15 दिन पहले जब गाइड भर्ती में धांधली की खबरें प्रमुखता से प्रकाशित हुई थीं, तब उम्मीद थी कि प्रबंधन अपनी कार्यप्रणाली सुधारेगा। लेकिन सुधार के बजाय, अब इस ‘बंदरबाँट’ को अंतिम रूप दिया जा रहा है। सूत्रों के हवाले से खबर है कि भर्ती की आखिरी प्रक्रिया गुपचुप तरीके से शुरू कर दी गई है और जल्द ही रसूखदारों को ‘गाइड’ की आधिकारिक टोपी पहना दी जाएगी।
नियमों की बलि और कोर्ट के आदेश की ‘जादुई’ व्याख्या
इस पूरे मामले में सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि प्रबंधन ने मानवीय संवेदनाओं और स्थापित नियमों को पूरी तरह से दफन कर दिया है। नियम कहते हैं कि गाइड की नियुक्ति में प्राथमिकता उन विस्थापित परिवारों को मिलनी चाहिए जिन्होंने अपनी जमीनें बाघों के लिए कुर्बान कर दीं, या उन परिवारों को जिन्होंने टाइगर अटैक (बाघ के हमले) में अपने अपनों को खोया है। वर्तमान में कार्यरत 197 गाइडों का दल पार्क के रोटेशन के लिए पूरी तरह पर्याप्त है, और नई भर्ती से पुराने गाइडों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा होना तय है। इसके बावजूद, प्रबंधन माननीय उच्च न्यायालय के ‘स्वविवेक से निर्णय’ लेने के आदेश को तोड़-मरोड़कर इस तरह पेश कर रहा है जैसे कोर्ट ने इन रसूखदारों को भर्ती करने का अनिवार्य फरमान दे दिया हो।
रसूखदारों पर मेहरबानी और लाखों की वसूली का ‘सिंडिकेट’
प्रबंधन की मेहरबानी का आलम यह है कि भर्ती की सूची में इंद्रपाल जैसे नाम शामिल बताए जा रहे हैं। सूत्रों का दावा है कि ये लोग रसूखदार पृष्ठभूमि से आते हैं, जिनमें से कोई नामी रिसॉर्ट का मैनेजर है तो कोई जिप्सी मालिक। खबर की सबसे सनसनीखेज कड़ी कथित अधिकारी का ड्राइवर मनीष बताया जा रहा है। सूत्रों के हवाले से खबर है कि मनीष इस समय ‘मैनेजमेंट’ के नाम पर भर्ती के इच्छुक उम्मीदवारों से ₹50,000 से लेकर ₹1,00,000 तक की मोटी रकम वसूलने में जुटा है।
स्थानांतरण के बाद भी वर्मा का ‘कुर्सी प्रेम’
पार्क के गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा पी.के. वर्मा को लेकर है। सूत्र बताते हैं कि वर्मा का स्थानांतरण कान्हा टाइगर रिजर्व के लिए हो चुका है, लेकिन उनका ‘कुर्सी मोह’ खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। चर्चा जोरों पर है कि साहब का मन अभी भी बांधवगढ़ की मलाई में अटका हुआ है। बेनामी नीरज के जरिए बोलेरो और सप्लाई के जो खेल चल रहे हैं, उनमें रुकावट न आए, शायद इसीलिए स्थानांतरण के बावजूद वर्मा का मोह बांधवगढ़ से नहीं छूट रहा है।
एसीएस वर्णवाल का संरक्षणः ‘गठबंधन’ की भेंट चढ़ रहा बांधवगढ़
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व इन दिनों प्रशासनिक ‘गठबंधन’ का शिकार हो रहा है। सूत्रों का कहना है कि पार्क प्रबंधन के स्थानीय अधिकारियों को एसीएस वर्णवाल (अपर मुख्य सचिव) का खुला संरक्षण प्राप्त है। इसी रसूखदार संरक्षण की धौंस दिखाकर नियमों को जूते की नोक पर रख रहे हैं। चर्चा है कि वर्णवाल जैसे बड़े अधिकारियों का वरदहस्त होने के कारण ही स्थानीय प्रबंधन बेखौफ होकर न्याय की बलि दे रहा है। एक तरफ रसूखदारों को उपकृत किया जा रहा है, तो दूसरी तरफ प्रबंधन की घोर लापरवाही से बाघ और उनके शावक मौत के घाट उतर रहे हैं।

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