चेंज ऑफ स्कोप' के नाम पर महालूट: 17 करोड़ के प्रोजेक्ट में सीवीसी नियमों की धज्जियां उड़ाकर हुआ 14 करोड़ का ओवर पेमेंट
सरकारी खजाने पर दिनदहाड़े डाका: के.के. सगौरा ग्रुप और पीडब्ल्यूडी अधिकारियों की साठगांठ से बिरसिंहपुर बाईपास में महाघोटाला
इंट्रो : बिरसिंहपुर बाईपास का निर्माण अब मध्य प्रदेश के सबसे बड़े घोटालों में शुमार होने जा रहा है, जहां ठेकेदार और अधिकारियों ने मिलकर लगभग 8 करोड़ रुपये डकार लिए हैं। 17 करोड़ रुपये के मूल टेंडर को बिलो में 15 करोड़ में लेकर के.के. सगौरा ग्रुप रीवा ने 'चेंज ऑफ स्कोप' के नाम पर महाभ्रष्टाचार की पटकथा लिख दी है। कंक्रीट की मजबूत सड़क की जगह महज डामर की लीपापोती कर दी गई और भ्रष्ट अधिकारियों ने आंखें मूंदकर 14 करोड़ रुपये का भारी-भरकम ओवर पेमेंट भी कर दिया। यह सिर्फ सरकारी खजाने की लूट नहीं, बल्कि सीवीसी और जीएफआर के नियमों का खुला और आपराधिक उल्लंघन है। इस धांधली ने राष्ट्रीय राजमार्ग संभाग (पीडब्ल्यूडी एनएच) की कार्यप्रणाली को नंगा कर दिया है और अब इस महाघोटाले की गूंज उच्च स्तरीय जांच तक का सफ़र तय करने को है जिसमें संबंधित जिम्मेदार अधिकारीयों के अप्रत्याशित कालकोठरी यात्रा की कयास लगाई जा रही है।
मीडिया हब शहडोल
गजेंद्र परिहार की रिपोर्ट
शहडोल / उमरिया : राष्ट्रीय राजमार्ग संभाग (पीडब्ल्यूडी एनएच) जबलपुर के अंतर्गत एनएच-43 बिरसिंहपुर बाईपास के निर्माण में ठेकेदार और विभागीय अधिकारियों की जुगलबंदी ने भ्रष्टाचार के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। इस पूरे प्रोजेक्ट में सरेआम 'चेंज ऑफ स्कोप' का गैरकानूनी खेल खेला गया है, जिससे सरकारी खजाने को 7 से 8 करोड़ रुपये का सीधा चूना लगा है। के.के. सगौरा ग्रुप रीवा द्वारा किए गए इस गुणवत्ताविहीन कार्य को पीडब्ल्यूडी एनएच के इंजीनियरों ने अपना खुला संरक्षण दे रखा है। एग्रीमेंट की शर्तों को रद्दी की टोकरी में डालकर ठेकेदार को करोड़ों का अनुचित लाभ पहुंचाया गया है। इस बंदरबांट ने साबित कर दिया है कि पूरा सिस्टम कमीशनखोरी की दीमक से खोखला हो चुका है और ठेकेदार के आगे पूरी तरह नतमस्तक है। बहरहाल जबलपुर से लेकर भोपाल तक के अधिकारियों को जवाब तो देना होगा ईओडब्ल्यू सतर्कता विभाग ना सही न्यायालय में तो जवाब देना पड़ेगा।
टेंडर का खेल और 8 करोड़ का सीधा घोटाला
बिरसिंहपुर बाईपास निर्माण के लिए असल में लगभग 17 करोड़ रुपये का टेंडर जारी हुआ था, जिसे ठेकेदार के.के. सगौरा ग्रुप रीवा ने बिलो रेट डालते हुए करीब 15 करोड़ रुपये में हासिल किया था। टेंडर की शर्तों के मुताबिक सड़क पर महंगी और मजबूत एम-40 ग्रेड की सीमेंट कंक्रीट बिछाई जानी थी। लेकिन मौके पर कंक्रीट के बजाय सस्ती डामर बिछा दी गई और अधिकारियों ने मिलीभगत कर ठेकेदार को लगभग 14 करोड़ रुपये का ओवर पेमेंट कर दिया। डामर के काम की वास्तविक लागत बमुश्किल 6-7 करोड़ आनी चाहिए थी, लेकिन ओवर पेमेंट करके सीधे तौर पर 7 से 8 करोड़ रुपये का महाघोटाला किया गया है। यह जनता की गाढ़ी कमाई की सरेआम डकैती है जिसे पीडब्ल्यूडी एनएच के संरक्षण में अंजाम दिया गया।
चेंज ऑफ स्कोप की आड़ में गैरकानूनी कृत्य
अधिकारियों और ठेकेदार ने इस पूरे भ्रष्टाचार को 'चेंज ऑफ स्कोप' का नाम देकर जायज ठहराने की जो कोशिश की है, वह पूरी तरह से इल्लीगल है। केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) और जीएफआर के नियम 144 के तहत टेंडर जारी होने के बाद काम के 'बेसिक नेचर' में ठेकेदार को लाभ पहुंचाने के लिए कोई बदलाव नहीं किया जा सकता। महंगी कंक्रीट का टेंडर लेकर सस्ती डामर लगाना 'पोस्ट-टेंडर मॉडिफिकेशन' है, जिसे किसी भी नियम के तहत लीगल नहीं माना जा सकता। यह कृत्य सीधे तौर पर 'बिड रिगिंग' (बोली में धांधली) की श्रेणी में आता है और ठेकेदार को अनुचित लाभ पहुंचाने का यह तरीका एक गंभीर वित्तीय अपराध है।
री-टेंडर न होना और बंदरबांट पर उठते गंभीर सवाल
सूत्र बताते हैं कि इस पूरे खेल में जबलपुर और भोपाल के उच्च अधिकारियों की नापाक साठगांठ है। दावा है कि 15 करोड़ का काम महज़ 2 से 3 करोड़ में निपटा लिया गया और बाकी करोड़ों की रकम का पीडब्ल्यूडी एनएच के जबलपुर-भोपाल अधिकारियों और ठेकेदार के बीच खुला बंदरबांट हुआ है। हालांकि, हम सूत्रों के इस दावे की पुष्टि नहीं करते, लेकिन यह बेहद गंभीर जांच का विषय है। 'चेंज ऑफ स्कोप' साफ तौर पर दर्शाता है कि ठेकेदार को सीधा फायदा पहुंचाया गया। यदि काम डामर का ही होना था, तो इसके लिए री-टेंडर क्यों नहीं किया गया? नियमतः जब कार्य का स्वरूप बदलता है, तो री-टेंडर अनिवार्य है। हो सकता था कि कोई अन्य ठेकेदार इसे के.के. सगौरा ग्रुप से भी कम रेट पर कर देता, फिर ऐसा क्यों नहीं किया गया? यह मिलीभगत और बड़े लेनदेन का सीधा प्रमाण है।
भ्रष्ट इंजीनियरों की कमीशनखोरी और के.के. सगौरा की मनमानी
इस पूरे महाघोटाले की मुख्य धुरी के.के. सगौरा ग्रुप रीवा है, जिसने निर्माण में गुणवत्ता के सारे मानकों को ताक पर रख दिया है। जब ठेकेदार कंक्रीट की जगह डामर बिछा रहा था, तब पीडब्ल्यूडी एनएच के भ्रष्ट अधिकारियों ने अपनी आंखें क्यों मूंद रखी थीं? बिना काम पूरा हुए 14 करोड़ के भारी-भरकम भुगतान की फाइल पर किस नियम के तहत दस्तखत किए गए? यह स्पष्ट रूप से कमीशनखोरी और अधिकारियों के गिरे हुए जमीर का प्रमाण है। इन भ्रष्ट इंजीनियरों की इसी मिलीभगत के कारण खजाने को करोड़ों का चूना लगा है। अगर इन पर जल्द कड़ी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह पूरा मामला भ्रष्टाचार की उच्च स्तरीय जांच के दायरे में आएगा।
इनका कहना है
इस संबंध में जानकारी के लिए लोक निर्माण विभाग पीडब्ल्यूडी के अधिकारी शंकर लाल को दूरभाष में संपर्क करने का प्रयास किया गया तो उनका फोन नहीं उठा। आधिकारिक पक्ष जानने के लिए संदेश भेजे गये जिनका जवाब प्राप्त नहीं हुआ । (संभव है की व्यापक भ्रष्टाचार की कलई खोलने के बाद खाने के लिए कथित अधिकारी के शब्द ही नहीं ।)
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