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क्या वन विभाग के 'वर्णवाल सिंडिकेट' की भेंट चढ़ा ईमानदार अफसर? लॉबी के खिलाफ जाना ही बना विपिन पटेल के इस्तीफे का कारण?



श्रद्धा पेंद्रो के 'अवैध विनियर अनापत्ति ' किलों को बचाने के लिए विभाग ने चली चाल? क्या विनियर संचालकों को उपकृत करने के लिए दी गई डीएफओ की बलि?


सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की सूली और पक्षपात का नंगा नाच: चुनिंदा मिलों के अनापत्ति निरस्त को लेकर  विपिन पटेल से मांगा गया था स्पष्टीकरण.. वही से शुरू हुआ दबाव का खेल




शहडोल/भोपाल। मध्यप्रदेश वन विभाग में चल रही ‘अंधेर गर्दी’ और अफसरों की ‘तानाशाही’ का एक और शर्मनाक अध्याय सामने आया है। एक ईमानदार आईएफएस अधिकारी विपिन पटेल को सिस्टम की सड़ांध और वरिष्ठ अधिकारियों के दबाव ने इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया। इस पूरे प्रकरण की जड़ अनूपपुर में नियमों के विरुद्ध दी गई ‘विनियर’ (पीलिंग) मिलों की अनुमति है, जिसे लेकर विभाग के भीतर एक बड़ा खेल खेला गया।





नियमों की अनदेखी और अजय पांडे की आपत्ति


इस पूरे मामले की पटकथा तब लिखी गई जब शहडोल (दक्षिण) की वर्तमान डीएफओ श्रद्धा पेंद्रो अनूपपुर के प्रभार में थीं। चर्चा है कि उन्होंने नियमों को ताक पर रखकर तीन विनियर मशीनों की अनुमति जारी कर दी थी। तत्कालीन सीसीएफ अजय पांडे ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई थी, लेकिन विभागीय सिंडिकेट के आगे उनकी एक न चली। इस मामले को प्रमुखता से उजागर किए जाने के बाद जब विपिन पटेल ने अनूपपुर डीएफओ का पदभार संभाला, तो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और नियमों का हवाला देते हुए उन तीनों अनुमतियों को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया।



चुनिंदा मेहरबानी और ‘पक्षपात’ का खुलासा


हैरानी की बात तब सामने आई जब विपिन पटेल ने इन अनुमतियों को निरस्त कर इसकी प्रतिलिपि वरिष्ठ अधिकारियों को भेजी। कायदे से तीन अनुमतियां निरस्त हुई थीं, लेकिन मनोज अग्रवाल ने केवल दो (अनिल अग्रवाल और एक अन्य) पर आपत्ति जाहिर करते हुए तत्कालीन डीएफओ विपिन पटेल से स्पष्टीकरण मांग लिया। जबकि तीनों ही अनुमतियां एक ही प्रक्रिया के तहत निरस्त की गई थीं, तो सिर्फ दो खास मिलों पर जवाब तलब किया जाना यह साफ इशारा करता है कि इन पर मनोज अग्रवाल की कोई ‘विशेष मेहरबानी’ थी। यही चुनिंदा रुख विभाग के भीतर मठाधीशों के निजी स्वार्थों और पक्षपात को प्रमाणित करता है।






अशोक वर्णवाल लॉबी और वर्चस्व का खेल


जनचर्चा और विभागीय गलियारों में यह बात जोरों पर है कि मध्यप्रदेश का वन विभाग भयंकर खेमेबाजी का शिकार है। बताया जाता है कि पूर्व एसीएस अशोक वर्णवाल के कुछ चहेते अधिकारियों की एक ऐसी लॉबी सक्रिय है, जिस पर यदि विभाग का कोई बड़ा अधिकारी हाथ डालता है, तो उसकी खुद की कुर्सी खतरे में आ जाती है। इस खास खेमे में उन अधिकारियों के शामिल होने की चर्चा है जो अशोक वर्णवाल और मनोज अग्रवाल के करीबी माने जाते हैं। बताया जाता है कि विनियर मामले में अनुमतियां निरस्त होने से यह लॉबी बुरी तरह नाराज हुई और इसी कारण मनोज अग्रवाल ने सीधे तौर पर विपिन पटेल को निशाना बनाया। इसी प्रकार की चर्चा बांधवगढ़ की फील्ड डायरेक्टर को लेकर भी विभाग में गर्म है, जहाँ नियमों से ऊपर रसूख को तवज्जो दी जा रही है।





विभागीय खेमेबाजी और ‘गले की फांस’ बना अवैध आदेश


वन विभाग में लॉबी का दबाव इस कदर हावी था कि विपिन पटेल पर लगातार अनुचित दबाव बनाया जा रहा था। अपने चहेते और खास खेमे के अधिकारी को बचाने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों ने सारी हदें पार कर दीं। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेशों की अवमानना करते हुए और प्रदेश के समस्त स्थापित नियमों को दरकिनार करते हुए आदेश जारी करने तक से पीछे नहीं हटे। हालत यह है कि आदेश अब स्वयं संबंधित अधिकारी के गले की फांस बनता नजर आ रहा है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि अपने चहेतों को संरक्षण देने के लिए वन विभाग का यह सिंडिकेट किसी भी स्तर तक जा सकता है। विभाग के इस गिरते स्तर और मठाधीशों की मनमानी को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि अब मुख्यमंत्री और प्रमुख सचिव का इस विभाग से नियंत्रण पूरी तरह खत्म हो चुका है जिससे अराजकता चरम पर है।


अपमान और प्रताड़ना का अंत


विपिन पटेल द्वारा नियमानुसार कार्रवाई करना वरिष्ठ अधिकारियों को इस कदर नागवार गुजरा कि उन्हें लगातार मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। इसी अपमान से तंग आकर उन्होंने इस्तीफा देना ही उचित समझा। शहडोल संभाग में कई डीएफओ वर्षों से जमे हुए हैं, लेकिन पटेल को अल्प कार्यकाल में हटाना यह साबित करता है कि यहाँ ईमानदार अफसरों के लिए जगह नहीं है। 


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