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शहडोल में 'बाघों के संहार' पर भोपाल का प्रहार: दो पर गिरी गाज, रेंजर तलब, अब बड़े 'मगरमच्छों' के फंसने की बारी


 बाघ-बाघिन की मौत के बाद 'अनाथ शावक' के सिर पर मंडरा रहा 'मौत का खतरा': माँ का साया उठते ही तीन दिन से लापता है जंगल का वारिस


भोपाल ने माना इसे 'आपराधिक लापरवाही': अजय दुबे की शिकायत पर पीसीसीएफ ने कसा शिकंजा, एक हफ्ते में देना होगा 'पाप' का हिसाब


 शहडोल में बाघ-बाघिन की मौत पर मचे हड़कंप के बाद पीसीसीएफ विजय अंबाड़े के निर्देश पर डीएफओ ने बीट गार्ड और डिप्टी रेंजर को सस्पेंड कर दिया है, जबकि रेंजर को नोटिस थमाया गया है। मामले में 'क्रिमिनल नेगलिजेंस' (आपराधिक लापरवाही) को लेकर एक्टिविस्ट अजय दुबे की शिकायत पर भोपाल मुख्यालय ने एक हफ्ते में रिपोर्ट तलब की है। लेकिन सबसे चिंताजनक पहलू उस 'अनाथ शावक' की जिंदगी है। डीएफओ तर्क दे रही हैं कि शावक 18 महीने का है और सक्षम है, लेकिन हकीकत यह है कि वह मौत के मुहाने पर खड़ा है। जंगल में टेरिटरी के लिए घूम रहे एडल्ट नर बाघ, मौत बनकर बिछे बिजली के तार और शिकारियों की मौजूदगी उसके लिए काल बनी हुई है। खतरा हर तरफ है, और विभाग उसे बचाने के बजाय आंकड़ों में उलझा हुआ है।



पीसीसीएफ के निर्देश पर डीएफओ की कार्यवाही

शहडोल उत्तर वन मंडल में बाघ और बाघिन की मौत के बाद आखिरकार प्रशासन की कुंभकर्णी नींद टूटी है। प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) विजय एन. अंबाड़े के सख्त निर्देशों और तीखे तेवरों के बाद स्थानीय अधिकारी हरकत में आए हैं। पीसीसीएफ के निर्देश पर उत्तर वन मंडल अधिकारी (डीएफओ) ने घोर लापरवाही के आरोप में बीट गार्ड राजेंद्र सिंह और डिप्टी रेंजर बृहस्पति पटेल को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है, जबकि वन परिक्षेत्र अधिकारी (रेंजर) को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। हालांकि, यह सवाल अभी भी खड़ा है कि क्या सिर्फ छोटे कर्मचारियों पर गाज गिराकर विभाग अपनी खाल बचा पाएगा, या जांच की आंच बड़े अधिकारियों तक भी पहुंचेगी?

 एक्टिविस्ट अजय दुबे की शिकायत पर भोपाल से 'समन' 

इस मामले ने अब तूल पकड़ लिया है। प्रसिद्ध आरटीआई एक्टिविस्ट और वन्यजीव प्रेमी अजय दुबे ने इस घटना को "क्रिमिनल नेगलिजेंस" करार देते हुए 2 फरवरी 2026 को एक औपचारिक शिकायत दर्ज कराई थी। उनकी इस शिकायत पर संज्ञान लेते हुए प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख (हॉफ) वी.एन. अंबाड़े ने 5 फरवरी 2026 को एक कड़ा पत्र जारी किया है। उन्होंने प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) से "एडमिनिस्ट्रेटिव ओवरहॉल" (प्रशासनिक फेरबदल) और लापरवाही के बिंदुओं पर एक सप्ताह के भीतर विस्तृत जांच रिपोर्ट तलब की है। यह पत्र साबित करता है कि भोपाल मुख्यालय अब स्थानीय अधिकारियों की रिपोर्ट से संतुष्ट नहीं है और बड़े बदलाव की तैयारी में है।

चेतावनी के बाद भी नहीं चेता विभाग: डीएफओ और एसडीओ क्यों हैं जिम्मेदार? 

इस मामले में केवल मैदानी अमले को दोषी मानना गलत होगा। असल जिम्मेदारी उत्तर वन मंडल अधिकारी (डीएफओ) और जयसिंहनगर के उप-वन मंडल अधिकारी (एसडीओ) की भी बनती है। यह "क्रिमिनल नेगलिजेंस" का मामला है, क्योंकि घटना से महज 2-3 दिन पहले ही इसी क्षेत्र से विभाग ने एक घायल बाघ को रेस्क्यू किया था। यह इस बात का पुख्ता सबूत था कि इलाके में बाघों का मूवमेंट बढ़ गया है। कायदे से उस घटना के तुरंत बाद डीएफओ और एसडीओ को पूरे इलाके में गश्त बढ़ा देनी चाहिए थी और बिजली के तारों की सघन चेकिंग होनी चाहिए थी। लेकिन स्पष्ट चेतावनी मिलने के बाद भी अधिकारी हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। अगर उस वक्त सतर्कता दिखाई होती, तो आज यह जोड़ा जिंदा होता।

करोड़ों का बजट 'स्वाहा' और नियमों की 'धज्जियां' 

वन विभाग 'प्रोजेक्ट टाइगर' और सुरक्षा के नाम पर सरकार से हर साल करोड़ों का बजट लेता है, लेकिन शहडोल की इस घटना ने साबित कर दिया है कि यह जनता की गाढ़ी कमाई की 'बर्बादी' है। नैतिक रूप से विभाग का कर्तव्य था कि वह इन बेजुबानों को सुरक्षा दे, लेकिन धरातल पर संसाधन नदारद हैं। यह मामला सीधे तौर पर वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 और एनटीसीए की गाइडलाइंस का उल्लंघन है। एनटीसीए का स्पष्ट एसओपी है कि बाघ प्रभावित क्षेत्रों में एम-स्ट्राइप्स ऐप के जरिए मॉनिटरिंग अनिवार्य है, लेकिन यहाँ सब 'हवा-हवाई' साबित हुआ। डीएफओ और एसडीओ सीधे तौर पर "सुपरवाइजरी नेगलीजेंस" के दोषी हैं क्योंकि उन्होंने यह सुनिश्चित नहीं किया कि मैदानी अमला प्रोटोकॉल का पालन कर रहा है या नहीं। इसके लिए सिविल सर्विस कंडक्ट रूल्स के तहत उन पर भी विभागीय जांच होनी चाहिए।

खाकी की 'घोर लापरवाही'

इस कार्यवाही ने यह साबित कर दिया है कि वन विभाग का तंत्र एक नहीं, बल्कि तीन-तीन मोर्चों पर पूरी तरह नकारा साबित हुआ है। सबसे बड़ी विफलता पेट्रोलिंग में कोताही रही, जिसका प्रमाण यह है कि बाघों के शव 72 घंटे (3 दिन) तक जंगल में सड़ते रहे। अगर मैदानी अमला रोज बीट में जाता, तो शवों की यह दुर्गति नहीं होती। दूसरी बड़ी चूक खुफिया तंत्र की है, क्योंकि जंगल में जीआई तार बिछाकर करंट दौड़ाया जा रहा था, लेकिन विभाग के मुखबिरों को इसकी भनक तक नहीं लगी। तीसरी और अहम लापरवाही मॉनिटरिंग की है, क्योंकि जिस क्षेत्र में बाघ परिवार घूम रहा था, वहां उनकी खोज-खबर नहीं ली जा रही थी।

तीन दिन से लापता है 'अनाथ शावक', नहीं कोई सुराग 

विभाग की नाकामी का सबसे बड़ा सबूत यह है कि घटना के तीन दिन बीत जाने के बाद भी अनाथ शावक का कोई पता नहीं चला है। अपनी गलती को छिपाने के लिए स्थानीय अधिकारी अब 'सफेद झूठ' का सहारा ले रहे हैं। विभाग दावा कर रहा है कि लापता शावक 'सब-एडल्ट' है और अपना शिकार खुद कर लेगा। लेकिन विश्वस्त सूत्रों के अनुसार, वह शावक महज 12 महीने (1 साल) का है। वन्यजीव विज्ञान स्पष्ट कहता है कि बाघ का शावक 18 से 22 महीने की उम्र तक अपनी माँ पर निर्भर रहता है। 12 महीने का शावक छोटे शिकार तो कर सकता है, लेकिन जंगल के कठोर नियमों में अकेले सर्वाइव करना उसके लिए नामुमकिन है।

हाथी दल से 4 दिन से जारी 'सर्चिंग', फिर भी खाली हाथ 

शावक को ढूंढने के लिए विभाग ने हाथी दल और सर्च टीमों को जंगल में उतारा है। पिछले 4 दिनों से लगातार सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है, लेकिन अब तक कोई कामयाबी नहीं मिली है। इस समय सबसे बड़ा खतरा यह है कि जंगल में अन्य बड़े और ताकतवर नर बाघ घूम रहे हैं। बाघों की दुनिया का क्रूर नियम है कि अपनी टेरिटरी पर कब्जा करने के लिए नर बाघ अक्सर दूसरे के शावकों को मार डालते हैं। एक साल का अनुभवहीन शावक उनका आसान शिकार बन सकता है। अगर जल्द ही उस नन्ही जान को रेस्क्यू नहीं किया गया, तो यह शहडोल वन विभाग के माथे पर एक और कलंक होगा।

इनका कहना है 

प्रथम दृष्टया जिनके लापरवाही समझ में आई है उन्हें निलंबित करने की कार्यवाही वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशन पर की गई है घटना स्थल पर लगभग 18 माह के सब एडल्ट शावक के पद मार्ग मिले हैं दो हाथी महावत और टीम लगाकर लगातार चार दिनों से सर्चिंग की जा रही है।  दोषी अधिकारियों को आरोप पत्र जारी किए जाएंगे उसे आधार पर कार्रवाई होगी।



तरुणा वर्मा 

डीएफओ, नॉर्थ शहडोल




शहडोल - बांधवगढ़ लैंडस्कैप में बाघों की लगातार मौत विशेषकर करेंट से होना वन विभाग की लापरवाही का नतीजा था। पीसीसीएफ हॉफ विजय अम्बाड़े के सख्त कार्रवाई के फलस्वरूप डिप्टी रेंजर और बीट गार्ड का सस्पेंड होना और रेंजर को शो कॉज नोटिस स्पष्ट करता है कि वन मुख्यालय अब बाघों के शिकार पर जीरो टॉलरेंस रखेगा 



अजय दुबे 

प्रख्यात वन्यजीव संरक्षण कार्यकर्ता एवं आरटीआई  एक्टिविस्ट

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