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कुछ अच्छा करने में अगर दाग लगते हैं तो दाग अच्छे हैं... कलेक्टर केदार सिंह का कदम जायज



बीएनएसएस 129 और ब्लू बुक का 'प्रॉक्सिमिटी रूल' पावर देता है: कलेक्टर का एक्शन कानून सही, डोकलाम का दूसरा भाग

काफिला भाजपा के किसी नेता का नहीं..प्रदेश के राष्ट्रीय मुखिया का था! एकल राजनीति से जुड़ा जा रहा मामला
 

 ब्लू बुक और सुरक्षा पैनल में पुलिस का सहयोग करना गलत कैसे? किस मामले को राजनीतिक रुख दे रही कांग्रेसी?


(गेजेंद्र सिंह परिहार की रिपोर्ट)


शहडोल। विज्ञापन की दुनिया का वो मशहूर नारा है- 'दाग अच्छे हैं'- शहडोल की ताज़ा घटना पर बिल्कुल अजनबी हैं। अगर प्रदेश के क्षेत्रीय मुखिया की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए, उपद्रवियों को गिरफ्तार करने के लिए और पुलिस बल का मोटापा बढ़ाने के लिए एक ग्रामीण को लाठी उठाने की जरूरत है, तो यह 'दाग' प्रशासन के खतरे पर खरा नहीं है, बल्कि उसकी सुरक्षा का सबूत है। यदि किसी भाजपा गैरसरकारी व्यक्ति की सुरक्षा से खिलवाड़ होता है तो शायद एक पल के लिए भी यह व्यक्ति गलत कदम उठाता है। 8 फरवरी को गोपालपुर में जो हादसा हुआ, वह कोई मामूली गलती नहीं थी, बल्कि एक 'तत्काल प्रतिक्रिया' थी। इसके अधिकार अधिकारी को धारा 129, पुलिस अधिनियम और ब्लू बुक देता है, कलेक्टर केदार सिंह ने जिस तरह पुलिस के कंधे से कंधा ऊपरी मोर्चा संभाला, वह साबित कर दिया कि जब वीवी आईपी सुरक्षा की बात होती है, तो फाइल की छवि से बाहरी रेखा पर 'एक्शन' लिया जाता है।


धारा 129, पुलिस अधिनियम और ब्लू बुक का अधिकार देती है


जो लोग एक्टर के एक्शन पर सवाल उठा रहे हैं, उन्हें पहले कानून की जानकारी लेनी चाहिए। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 129 मेजर मजिस्ट्रेट (कलेक्टर) को यह स्पष्ट शक्ति मिलती है कि वह किसी भी गैर-कानूनी भीड़ को तितर-बितर करने के लिए 'सिविल बल' का प्रयोग करवा सकता है। इतना ही नहीं, पुलिस अधिनियम के अंतर्गत जिलों में कानून व्यवस्था का अंतिम प्रभारी (आपराधिक प्रशासन का प्रमुख) शिक्षक ही होता है। जब पुलिस बल को सहयोग की आवश्यकता हो, तो हस्तक्षेप करना उनका कर्तव्य है। सबसे अहम है सेंट्रल मिनिस्ट्री की 'ब्लू बुक' (ब्लू बुक), जिसका कहना है कि वीआइपी के 'प्रॉक्सिमिटी एरिया' (आसकी रूम) में अनाधिकृत प्रवेश 'जीरो टॉलरेंस' में होगा। कलेक्टर ने लाठीचार्ज में कोई अपराध नहीं किया, बल्कि ब्लू बुक के दस्तावेज़ और मजिस्ट्रियल पावर का इस्तेमाल कर सीएम की सुरक्षा को सुनिश्चित किया है।


राजनीति से परे मुख्यमंत्री प्रदेश का नेतृत्वकर्ता मुखिया

विरोध करने वालों को अपनी-अपनी पसंद से बाहर आना होगा। एक मुख्यमंत्री किसी पार्टी-चाहे वह भाजपा हो या कांग्रेस-का नहीं होता, वह पूरे प्रदेश का मुखिया होता है। डॉ. मोहन यादव उस दिन शहडोल में राजनीति करने नहीं, बल्कि विकास की नई पटकथा आये थे। उनमें से लाखों की संख्याएँ और परिभाषाएँ जारी की गईं, जिनमें जिलों की तस्वीरें बदलनी थीं। ऐसे में उनकी सुरक्षा का दायित्व सिर्फ उनकी निजी सुरक्षा टीम का नहीं था, बल्कि जिला प्रशासन और पुलिस का सर्वोच्च दायित्व था। जो लोग उनके साथियों को रोक रहे थे, वे सीएम को नहीं, बल्कि शहडोल के विकास को रोक रहे थे। मुख्यमंत्री की सुरक्षा से सीधे तौर पर प्रदेश के मान-सम्मान पर हमला है, जिसे जिला प्रशासन ने विफल कर दिया है।


खाकी और बॅकटी का अद्भुत संगम

कांग्रेस कार्यकर्ता जिस तरह सीएम के काफिले में घुसने की कोशिश कर रहे थे, वह एक सामान्य लोकतांत्रिक विरोध नहीं था। वह एक सुरक्षा उल्लंघन (Security Breach) की गंभीर कोशिश थी। ऐसे नाजुक वक्त में जब पुलिस के जवान अपनी पूरी ताकत से भीड़ को रोक रहे थे, कलेक्टर का बीच में आना पुलिस की कमजोरी नहीं, बल्कि पुलिस के हाथ मजबूत करना था। उन्होंने लाठी इसलिए नहीं उठाई कि उन्हें शौक था, बल्कि इसलिए उठाई ताकि पुलिस को यह महसूस हो कि उनका कप्तान एसी कार में बैठकर तमाशा नहीं देख रहा, बल्कि उनके साथ मैदान-ए-जंग में खड़ा है। यह पुलिस और प्रशासन की जुगलबंदी थी जिसने सीएम को सुरक्षित निकाला।


चित भी मेरी, पट भी मेरी? करे तो गुनाह न करे तो भी 

चर्चाओं का बाजार गरम है की प्रशासन करे तो भी क्या....राजनीति से परे  आलोचना करने वाले जरा दिल पर हाथ रखकर सोचें—अगर उस दिन थोड़ी सी भी ढिलाई बरती जाती और मुख्यमंत्री के काफिले पर पथराव हो जाता या कोई बड़ा हादसा हो जाता, तो क्या वे कलेक्टर को बख्श देते? तब यही नेता सबसे पहले चिल्लाते कि 'प्रशासन की नाकामी' है और कलेक्टर को सस्पेंड करने की मांग करते। आज जब प्रशासन ने मुस्तैदी दिखाकर उस संभावित हादसे को टाल दिया, तो उन्हें तरीका खटक रहा है? प्रशासन का काम 'तालियां बटोरना' नहीं, 'जान बचाना' है, और शहडोल प्रशासन ने वही किया। सुरक्षा में चूक होने पर जो मातम मनाया जाता, उससे कहीं बेहतर है कि आज थोड़ी सख्ती पर शोर मचाया जा रहा है।

 

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