जब बाघ मर रहे थे और शावक बिक रहे थे, तब कहां थे 'साहब'? लोकेशन बताने में कांपे हाथ, टूर डायरी न देना साबित करता है — पूरी दाल काली है!
बांधवगढ़ में 'खाकी' का खुला विद्रोह! PCCF मांग रहे हिसाब, अधिकारी साध रहे चुप्पी; हाई कोर्ट की सख्ती के बाद 3 दिन का अल्टीमेटम, क्या अब खुलेगा राज?
सुरक्षित एनक्लोजर से एक माह से बाघ शावक गायब है, जिसे कथित तौर पर अधिकारियों ने 'बेच' दिया। प्रबंधन की मौजूदगी में बाघ पर लाठी-डंडे बरसाए गए, लेकिन मामला ठंडे बस्ते में। महज 20 दिनों के भीतर 6 बाघों की संदिग्ध मौत, मामला ठंडे बस्ते में। तत्कालीन डिप्टी डायरेक्टर पीके वर्मा पर लगे गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप, जांच ठंडे बस्ते में। और तो और, मैनुअल पर्ची के जरिए अवैध सफारी का खेल, यह भी ठंडे बस्ते में। बांधवगढ़ में चल रही इस 'अंधेर गर्दी' के बीच भोपाल से आए एक पत्र ने अब बवाल मचा दिया है। यह पत्र साबित करता है कि जहाँ एक तरफ मुख्यमंत्री लगातार सख्ती के निर्देश दे रहे हैं, वहीं अधिकारी उन आदेशों को धता बताकर अपनी मनमानी चला रहे हैं।
उमरिया/भोपाल (विशेष संवाददाता गजेंद्र सिंह परिहार की रिपोर्ट)
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व का प्रशासन अब पूरी तरह से बेलगाम हो चुका है और इसका सबसे बड़ा 'लिखित प्रमाण' अब सामने आ गया है। भोपाल से प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) शुभरंजन सेन द्वारा 23 जनवरी 2026 को जारी एक अत्यंत सख्त पत्र (क्रमांक 723) ने बांधवगढ़ के फील्ड डायरेक्टर डॉ. अनुपम सहाय और उनकी पूरी टीम की पोल खोलकर रख दी है। यह पत्र चीख-चीख कर बता रहा है कि जंगल में गश्त सिर्फ कागजों पर हो रही है और मैदानी हकीकत सिफर है।
कागजी गश्त, हकीकत में मौतें
हैरानी की बात यह है कि पिछले 6 महीनों से फील्ड डायरेक्टर और डिप्टी डायरेक्टर ने अपनी मासिक 'दौरा दैनंदिनी' (टूर डायरी) मुख्यालय को भेजी ही नहीं है। भोपाल से बार-बार रिमाइंडर (17 दिसंबर 2025, 13 जनवरी 2026 और 21 जनवरी 2026) भेजे गए, लेकिन बांधवगढ़ के अधिकारियों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। पीसीसीएफ ने अपने पत्र में इसे 'अत्यंत खेद का विषय' और 'वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों की खुली अवहेलना' करार दिया है। जब जंगल का राजा मर रहा था, तब ये अधिकारी कहाँ थे? इसका जवाब देने के लिए इनके पास कोई रिकॉर्ड ही नहीं है।
अजय दुबे का तीखा प्रहार
प्रख्यात वन्यजीव संरक्षण कार्यकर्ता अजय दुबे, जिनकी याचिका पर हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है, ने इस पत्र को सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए विभाग की कार्यशैली पर करारा तंज कसा है। उन्होंने लिखा, "मध्य प्रदेश के पीसीसीएफ और चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन को बुनियादी रिपोर्ट के लिए 'भीख' मांगनी पड़ रही है, जबकि हाई कोर्ट सब देख रहा है। यह अक्षमता है या जानबूझकर की गई अनुशासनहीनता? बांधवगढ़ के बाघ मर रहे हैं, फिर भी अधिकारी अपनी अनिवार्य टूर डायरी तक जमा नहीं कर रहे हैं। यह बेहद शर्मनाक है।" अजय दुबे का यह बयान साफ करता है कि बांधवगढ़ में अधिकारियों की मनमानी अब बर्दाश्त के बाहर हो चुकी है।
हाई कोर्ट की सख्ती, 3 दिन का अल्टीमेटम
पत्र में साफ लिखा है कि पिछले 02 माह में बांधवगढ़ में बाघ और तेंदुए की मृत्यु की घटनाएं लगातार हो रही हैं। मामला अब माननीय उच्च न्यायालय जबलपुर की दहलीज पर है, जिसने 20 जनवरी 2026 को आदेश पारित किए हैं और अगली सुनवाई 11 फरवरी 2026 को होनी है। कोर्ट को जवाब देना है, लेकिन अधिकारियों के पास अपनी लोकेशन बताने के लिए डायरी तक नहीं है। अब पीसीसीएफ ने आर-पार के मूड में फील्ड डायरेक्टर को 3 दिन का अल्टीमेटम दिया है कि फरवरी 2025 से आज तक की लंबित टूर डायरी 'सर्वोच्च प्राथमिकता' के साथ जमा करें, अन्यथा नियमानुसार कार्यवाही के लिए तैयार रहें।
डायरी नहीं, 'काले कारनामों' का सबूत
फरवरी 2025 से लेकर अब तक की डायरी न भेजना महज एक भूल नहीं हो सकती। सूत्रों की मानें तो यह भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने की एक सोची-समझी साजिश हो सकती है। जब दौरा ही नहीं हुआ, तो डायरी में क्या भरेंगे? और अगर दौरा नहीं हुआ, तो पेट्रोल, गाड़ी और गश्त के नाम पर जो सरकारी खजाना खाली किया गया, उसका हिसाब कौन देगा? टूर डायरी का गायब होना इस बात का प्रबल संकेत है कि बांधवगढ़ में 'मैनेजमेंट' के नाम पर बड़ा गोलमाल चल रहा है।
'अंधेर नगरी': फर्जीवाड़ा और 6 मौतें
बांधवगढ़ का प्रबंधन भ्रष्टाचार और क्रूरता की नई इबारत लिख रहा है। यहाँ का 'ट्रैक रिकॉर्ड' रोंगटे खड़े करने वाला है। भ्रष्टाचार का आलम यह है कि नियमों को ताक पर रखकर फर्जी मैनुअल पर्चियां काटकर अवैध सफारी का काला कारोबार धड़ल्ले से चलाया जा रहा है, जिसकी लिखित शिकायत प्रमाणों के साथ सीईसी (CEC) दिल्ली में दर्ज कराई जा चुकी है। जनवरी 2026 के मात्र पहले 20 दिनों के भीतर ही 6 बाघों की संदिग्ध मौतों ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था। क्रूरता की हदें तो तब पार हो गईं जब इसी प्रबंधन की नाक के नीचे राष्ट्रीय पशु 'बाघ' पर लाठी-डंडे बरसाए गए और सुरक्षित माने जाने वाले 'एनक्लोजर' से एक बाघ शावक रहस्यमयी तरीके से लापता हो गया। हद तो यह है कि प्रबंधन अपनी नाकामी छुपाने के लिए रसूखदारों को संरक्षण दे रहा है। विस्थापितों के पेट पर लात मारकर और उनका हक डकार कर 'रसूखदारों' को 'गाइड' की सरकारी नौकरी से नवाजा गया, जो सीधे तौर पर गरीबों के अधिकारों का हनन है।
अब देखना यह होगा कि 3 दिन के अल्टीमेटम के बाद यह डायरी रातों-रात "तैयार" की जाती है या फिर अधिकारी अपनी नाकामी स्वीकार करते हैं। बांधवगढ़ का प्रबंधन अब सवालों के घेरे में नहीं, बल्कि सीधे कटघरे में खड़ा है।

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