अवैध शराब का मकड़जाल: कल्याणपुर और सिंहपुर से लेकर डिंडोरी बॉर्डर तक मौत के सौदागरों का राज
पांडेय के 'लिफाफे' तले दबी खाकी की खुद्दारी, वीरेंद्र और उसके आधा सैकड़ा हथियारबंद गुर्गों के इशारों पर नाच रहा पूरा सिस्टम
आधा सैकड़ा अवैध ठिकानों पर परोसा जा रहा जहर, झरिया जी से लेकर बीट इंचार्जों तक सबने मूंदी आंखें
शहडोल जिले में अब कानून का नहीं बल्कि अवैध शराब माफियाओं का सिक्का चल रहा है। अलसुबह कल्याणपुर और सिंहपुर रोड से शराब की गाड़ियां लोड होकर मौत का सफर तय करती हैं, जिन पर रोक लगाने वाला कोई नहीं है। प्रशासन की नाक के नीचे पनप रहा यह काला कारोबार अब डिंडोरी की सीमाओं को भी लांघ चुका है। माफियाओं के हौसले इतने बुलंद हैं कि अब ढाबों और किराना दुकानों को ही मयखाना बना दिया गया है। खाकी वर्दी का जमीर चंद लिफाफों में बिक चुका है, जिससे आम जनता का पुलिस प्रशासन से भरोसा पूरी तरह उठ गया है। सरेआम सड़कों पर माफियाओं का यह नंगा नाच व्यवस्था के मुंह पर एक करारा तमाचा है।
शहडोल: मुख्यालय के इर्द-गिर्द अब अवैध शराब के अड्डों की बाढ़ सी आ गई है, जहां पहले 37 ठिकाने थे, वह आंकड़ा अब बढ़कर लगभग आधा सैकड़ा पार कर चुका है। कल्याणपुर और सिंहपुर मार्ग से शुरू होने वाली यह तस्करी अब पचगांव, अमरहा, सिंहपुर, बंधवा, बड़ा गांव सहित कोटमा जमुई के कोने-कोने तक पहुंच गई है। डिंडोरी जिले की सीमा चंदन घाट तक के ढाबे और दुकानें इस अवैध सप्लाई के सबसे बड़े केंद्र बन चुके हैं। रात के अंधेरे में बुढ़ार और जैतपुर से भी गाड़ियां लोड होकर सीधे छत्तीसगढ़ और दर्शील की ओर रवाना की जा रही हैं। यह सब कुछ एक सोची-समझी रणनीति के तहत हो रहा है, जिसे रोकने की जहमत कोई भी जिम्मेदार अधिकारी नहीं उठाना चाहता। सरेआम हो रही इस आपूर्ति ने शहर की शांति और सुरक्षा व्यवस्था की धज्जियां उड़ाकर रख दी हैं।
सिंडिकेट के सरगना और मैनेजमेंट का उस्ताद
सूत्रों की मानें तो इस पूरे अवैध साम्राज्य की कमान वीरेंद्र नामक सरगना के हाथों में है, जिसके इशारे पर जिले भर में शराब का खेल चलता है। इस पूरे सिंडिकेट की ग्राउंड लेवल पर निगरानी का जिम्मा पांडेय नामक व्यक्ति के पास है, जो हर गतिविधि को अपने नियंत्रण में रखता है। वहीं, तंत्र को साधने और मैनेजमेंट के खेल में गुड्डू का नाम पूरे शहर में आम हो चुका है, जिसे इस काले धंधे का उस्ताद माना जाता है। इन तीनों की तिकड़ी ने जिले में ऐसा जाल बिछाया है कि प्रशासन इनके सामने बौना साबित हो रहा है। रसूख और पैसे के दम पर यह सिंडिकेट न केवल कानून का मखौल उड़ा रहा है, बल्कि युवाओं की नसों में बेखौफ जहर घोलने का काम भी बदस्तूर जारी रखे हुए है। माफियाओं का यह त्रिकोण अब जिले के लिए एक नासूर बन चुका है।
खाकी की खामोशी और झरिया जी का अनजान रूप
शराब तस्करी के इस नंगे नाच के बीच स्थानीय पुलिस की रहस्यमयी खामोशी कई गंभीर सवाल खड़े करती है। सिंहपुर थाना क्षेत्र में जब खुलेआम ढाबों पर शराब परोसी जाती है, तब पुलिस को इसकी भनक तक क्यों नहीं लगती, यह एक बड़ा यक्ष प्रश्न है। बताया जाता है कि सब कुछ जानकर भी सिंहपुर पुलिस के झरिया जी अनजान बनने का गजब का नाटक कर रहे हैं। सरेआम हो रही इस सप्लाई को रोकने के बजाय पुलिस की यह उदासीनता माफियाओं को खुला संरक्षण देने जैसी है। क्षेत्र में पुलिस की गश्त और खुफिया तंत्र पूरी तरह से फेल हो चुका है, या यूं कहें कि उसे जानबूझकर पंगु बना दिया गया है। खाकी की यह चुप्पी सीधे तौर पर अपराधियों के साथ उसकी गहरी सांठगांठ की गवाही दे रही है।
बीट इंचार्जों की चुप्पी और लिफाफों का खेल
केवल सिंहपुर ही नहीं, बल्कि कोतवाली और सोहागपुर पुलिस का हाल भी बद से बदतर हो चुका है। इन क्षेत्रों के बीट इंचार्ज भी शराब माफियाओं के सामने अपनी आंखें बंद करके बैठे हैं, जैसे उन्हें कुछ दिखाई ही न दे रहा हो। चर्चाएं तो यहां तक आम हैं कि इस चुप्पी के एवज में जिम्मेदार पुलिसकर्मी बाकायदा कथित पांडेय के 'दरबार' में अपनी हाजिरी लगाने जाते हैं। जब 'लिफाफों' का वजन भारी होता है, तो पुलिस अधिकारी अपनी वर्दी की गरिमा और जिम्मेदारियों को तिलांजलि देने में जरा भी संकोच नहीं करते। चंद रुपयों की खातिर ड्यूटी से यह गद्दारी पूरे महकमे को दागदार कर रही है। जब रक्षक ही भक्षक बनकर लिफाफों के सामने बेबस हो जाएं, तो आम जनता न्याय की गुहार लगाने आखिर किसके दरवाजे पर जाए।
रात के अंधेरे में सीमाओं के पार तस्करी
जिले की सीमाएं भी अब इन तस्करों के लिए खुली छूट का मैदान बन चुकी हैं, जहां से बिना किसी खौफ के माल पार कराया जा रहा है। बुढ़ार और जैतपुर के अड्डों से रात के घने अंधेरे का फायदा उठाकर शराब से लदे वाहन छत्तीसगढ़ तक का सफर तय कर रहे हैं। इस अंतर्राज्यीय तस्करी को रोकने के लिए बनाए गए चेकपोस्ट और बैरियर भी इन माफियाओं के 'मैनेजमेंट' के आगे नतमस्तक नजर आते हैं। दर्शील और जैतपुर के रास्तों का इस्तेमाल एक सुरक्षित कॉरिडोर की तरह किया जा रहा है। यदि पुलिस और आबकारी विभाग ने जल्द ही अपनी कुंभकर्णी नींद नहीं तोड़ी, तो यह अवैध कारोबार पूरे संभाग को अपनी गिरफ्त में ले लेगा। सिस्टम की यह लाचारी और माफियाओं की यह दबंगई एक बड़े विस्फोट की ओर इशारा कर रही है।


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