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बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में 'धक्कामार' सफारी: खटारा जिप्सियों और वीआईपी कल्चर के बोझ तले दब रही विश्व प्रसिद्ध पार्क की साख

 




अधिकारियों की आपसी खींचतान और 'बेलगाम' अफसरशाही का अड्डा बना बांधवगढ़; पीसीसीएफ के आदेशों को ठेंगा, रसूखदारों की सजी महफिलें


"बांधवगढ़ में 'टाइगर' नहीं, तंत्र हुआ पस्त: अफसरों की जुगलबंदी और रसूखदारों के 'दोस्ताना' ने पर्यटन को बनाया बंधक, जोहिला की घटना ने खोली पोल"


"बांधवगढ़ का 'सिस्टम' फेल: खटारा वाहन, वीआईपी का दबदबा और अफसरों की मनमानी; पर्यटन के नाम पर पर्यटकों से खिलवाड़"


"हादसे के इंतज़ार में बांधवगढ़ प्रबंधन! शिकायतों का अंबार और फाइलों में दबे भ्रष्टाचार के मसौदे, क्या बाघों के अस्तित्व पर मंडरा रहा है खतरा?"


बबांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में प्रशासनिक व्यवस्थाएं अब सवालों के घेरे में हैं, जहां खटारा जिप्सियों और वीआईपी कल्चर के प्रति कथित झुकाव ने पर्यटकों की सुरक्षा को हाशिए पर धकेल दिया है। जोहिला जोन में पर्यटकों द्वारा गाड़ी धकेलने की घटना ने न केवल प्रबंधन की कार्यप्रणाली को उजागर किया है, बल्कि अधिकारियों और बाहरी रसूखदारों के बीच के तालमेल पर भी जनचर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। आम आदमी के लिए बाघ का दीदार अब दुर्लभ होता जा रहा है, जबकि पार्क के भीतर नियमों की अनदेखी और भ्रष्टाचार के दबे हुए मसौदे बांधवगढ़ की साख को नुकसान पहुँचा रहे हैं।




शहडोल/उमरिया। विश्व प्रसिद्ध बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व इन दिनों वन्यजीव संरक्षण के बजाय प्रशासनिक अक्षमता और कथित कुप्रबंधन के कारण सुर्खियों में है। ताला के जोहिला जोन में सफारी के दौरान जिप्सी का खराब होना और पर्यटकों द्वारा उसे धक्का लगाना इस बात का प्रमाण है कि यहाँ व्यवस्थाएं पटरी से उतर चुकी हैं। पीड़ित पर्यटक द्वारा की गई आधिकारिक शिकायत ने प्रबंधन के उन दावों की पोल खोल दी है जिनमें सुरक्षा को सर्वाेपरि बताया जाता है। फील्ड डायरेक्टर डॉ. अनुपम सहाय और डिप्टी डायरेक्टर पी.के. वर्मा के कार्यकाल में पार्क की साख पर जो सवाल उठ रहे हैं, उनके पीछे की वजह प्रशासनिक ढिलाई बताई जा रही है।




प्रशासनिक कलह और आपसी खींचतान


बांधवगढ़ प्रबंधन के भीतर आंतरिक समन्वय की कमी अब खुलकर सामने आने लगी है। चर्चा है कि उपसंचालक पी.के. वर्मा द्वारा नियमों के उल्लंघन पर जिस जिप्सी चालक और गाइड को प्रतिबंधित कराया गया था, उसे एसडीओ दिलीप मराठा द्वारा कथित तौर पर पुनः बहाल किए जाने से विरोधाभास की स्थिति निर्मित हो गई है। यह मामला स्पष्ट करता है कि पार्क के भीतर अनुशासन के मापदंड अलग-अलग अधिकारियों के लिए अलग-अलग हो सकते हैं। अधिकारियों के बीच की यह आपसी खींचतान पार्क की सुरक्षा और संचालन को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही है।



आदेशों की सरेआम अवहेलना


बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के अधिकारी अब प्रदेश शासन और प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) के आदेशों को भी ठेंगा दिखाने से गुरेज नहीं कर रहे हैं। चर्चा है कि शासन स्तर से जारी निर्देशों और पीसीसीएफ के कड़े प्रोटोकॉल को ताक पर रखकर यहाँ अधिकारी अपनी अलग ही सत्ता चला रहे हैं। वन्यजीवों की सुरक्षा और पर्यटन के मानकों को लेकर जो गाइडलाइंस भोपाल से जारी की जाती हैं, उन्हें जमीनी स्तर पर कुचला जा रहा है। अधिकारियों की यह मनमानी न केवल शासन की छवि खराब कर रही है, बल्कि बांधवगढ़ के अस्तित्व को भी खतरे में डाल रही है।



अधिकारियों के ‘जुड़ाव’ और सुलगते सवाल


बांधवगढ़ के गलियारों में फील्ड डायरेक्टर और डिप्टी डायरेक्टर के बीच के प्रगाढ़ तालमेल को लेकर कई तरह की जनचर्चाएं व्याप्त हैं। सूत्र बताते हैं कि रसूखदार रिजॉर्ट संचालकों के साथ प्रबंधन का कथित ‘दोस्ताना’ रवैया नियमों के क्रियान्वयन में आड़े आ रहा है। चर्चा यह भी है कि रसूखदारों के साथ होने वाले कथित मेल-मिलाप और महफिलों के कारण पार्क की बुनियादी व्यवस्थाओं पर ध्यान कम होता जा रहा है। हालांकि इन चर्चाओं की आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन पार्क के भीतर पर्यटकों के साथ हो रही घटनाएं और नियमों की शिथिलता इन चर्चाओं को बल दे रही हैं।




उच्च प्रबंधन की चुप्पी और लापरवाही


सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर बांधवगढ़ में मचे इस तांडव पर भोपाल में बैठे प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ वाइल्डलाइफ) और दिल्ली की राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) ने रहस्यमयी चुप्पी क्यों साध रखी है? आखिर उच्च प्रबंधन कार्यवाही करने से क्यों हिचक रहा है? क्या जिम्मेदार अधिकारी इस बात का इंतज़ार कर रहे हैं कि जब बांधवगढ़ से बाघों का नामोनिशान मिट जाएगा, तब जाकर कोई एक्शन लिया जाएगा? आखिर प्रदेश शासन इन बेलगाम अधिकारियों पर कार्यवाही करने के बजाय उन पर क्यों मेहरबान है?




वीआईपी कल्चर और आम पर्यटक की मायूसी


बांधवगढ़ में अब बाघ की साइटिंग कथित तौर पर वीआईपी कल्चर की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। रसूखदार और ऊंचे जुगाड़ वाले लोग के लिए नियम शिथिल कर दिए जाते हैं, जबकि दूर-दराज से आने वाला आम पर्यटक मायूस होकर लौट रहा है। चर्चा है कि रसूखदारों को खुश करने के फेर में कभी मगधी जोन में बाघ शावकों को जिप्सियों से घेरा जाता है, तो कभी सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के विपरीत मोबाइल का धड़ल्ले से उपयोग किया जाता है। आम आदमी के लिए बाघ अब केवल उन हाई-फाई वीडियो तक सीमित रह गया है जो प्रभावशाली लोगों की सरपरस्ती में सोशल मीडिया पर वायरल किए जाते हैं।


दबे हुए मसौदे और भविष्य का खतरा


जोहिला की घटना को दबाने का प्रयास प्रबंधन की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। डिप्टी डायरेक्टर के खिलाफ पूर्व में की गई शिकायतों और गंभीर आरोपों का मसौदा कथित तौर पर भोपाल स्तर पर लंबित है, जिसे रसूख के चलते अब तक ठंडे बस्ते में रखा गया है। फील्ड डायरेक्टर की इस पूरे प्रकरण पर रहस्यमयी चुप्पी पार्क के भविष्य के लिए चिंता का विषय है। क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे के बाद ही जागेगा? इस पूरे तंत्र के भीतर छिपे रसूख के खेल पर हमारी नजर बनी रहेगी।


इनका कहना है


(पर्यटकों से धक्का लगवाने मामले में हुई शिकायत और जारी नोटिस के सम्बन्ध में रेंज ऑफिसर पर्यटन अंकित सोनी से दूरभाष में मामले की जानकारी लेने का प्रयास किया गया लेकिन उनका फोन नहीं उठा)

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