सरकारी रसूख का खूनी 'क्रिसमस सेलिब्रेशन': डीएफओ श्रद्धा पेंद्रे की लापरवाही ने उजाड़े घर!
कार्यक्षेत्र से बाहर सरकारी बोलेरो में पिकनिक मनाना पड़ा भारी; दो की मौत, पांच जिंदगी और मौत के बीच
शहडोल/उमरिया: जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं और सरकारी संपदा को अपनी जागीर समझ लिया जाए, तो अंजाम मौत बनकर सामने आता है। शहडोल दक्षिण की डीएफओ श्रद्धा पेंद्रे एक बार फिर विवादों के घेरे में हैं, और इस बार दाग किसी भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि मासूमों के खून का है।
रसूख का नशा और सरकारी बोलेरो का 'निजी तमाशा'
खबर शर्मनाक भी है और डरावनी भी। कल रात जब दुनिया सो रही थी, तब मैडम डीएफओ के "पारिवारिक सदस्य" सरकारी बोलेरो में सवार होकर बांधवगढ़ या जंगल की सैर का लुत्फ उठाने निकले थे। सवाल यह है कि जनता के टैक्स के पैसे से चलने वाली गाड़ी क्या किसी अधिकारी की पारिवारिक पिकनिक के लिए है? हैरानी की बात तो यह है कि उस दिन क्रिसमस की छुट्टी थी और डीएफओ शहडोल दक्षिण का कार्यक्षेत्र कहीं से भी घुनघुटी या उमरिया जिले में नहीं आता। सवाल यह उठता है कि जब मैडम का क्षेत्र शहडोल दक्षिण है, तो उनकी सरकारी गाड़ी दूसरे जिले के जंगल में क्या कर रही थी? अगर कोई विभागीय काम भी था, तो वह अपने क्षेत्र में होना चाहिए था। सरकारी गाड़ी का इस तरह दूसरे क्षेत्र में पारिवारिक पिकनिक के तौर पर निजी उपयोग करना, रसूख के खुले दुरुपयोग का जीता-जागता प्रमाण है।
मदारी ढाबा के पास बिछी लाशें, हमारी संवेदनाएं
घुनघुटी के पास मदारी ढाबा के समीप खड़ी एक ट्रक में यह सरकारी बोलेरो इतनी तेजी से घुसी कि गाड़ी के परखच्चे उड़ गए। इस भीषण हादसे ने दो परिवारों के चिराग बुझा दिए। मृतक चालक इजहार खान (32 वर्ष) और एक अन्य व्यक्ति की अकाल मृत्यु ने हमें झकझोर कर रख दिया है। इस हृदयविदारक घटना पर हम अपनी गहरी शोक संवेदना व्यक्त करते हैं। हम वास्तविकता में इस अपूरणीय क्षति से दुखी हैं और ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि मृतकों के परिवारों को यह असीम दुख सहने की शक्ति दे। साथ ही, हादसे में घायल बेटियों के जल्द स्वस्थ होने की कामना करते हैं।
सिस्टम की बेशर्मी पर कड़ा प्रहार
अब सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन सिर्फ खानापूर्ति के लिए एफआईआर दर्ज करके फाइल को ठंडे बस्ते में डाल देगा? आखिर सरकारी संसाधनों को अपनी निजी जागीर समझने वाली डीएफओ श्रद्धा पेंद्रे पर इस लापरवाही और नियमों की धज्जियां उड़ाने के लिए ठोस कार्रवाई कब होगी? जब रसूख के नशे में चूर अधिकारी सरकारी गाड़ियों को अपनी 'प्राइवेट पिकनिक टैक्सी' बनाएंगे, तो बेगुनाह लोगों का खून इसी तरह सड़कों पर बहता रहेगा। यह महज एक सड़क हादसा नहीं है, बल्कि उस सरकारी घमंड का नतीजा है जो कानून को अपनी जेब में रखकर चलता है।
असली अपराधी कौन?
सवाल यह उठता है कि अगर रात में शासकीय वाहन का इस्तेमाल सैर-सपाटे के लिए न होता, तो शायद बेगुनाहों की जानें बच जातीं। लेकिन जब कुर्सी की गर्मी सिर चढ़कर बोलती है, तो ऐसी ही घटनाएं कारित होती हैं। सत्ता के नशे में चूर होकर किए गए इस कृत्य को महज एक 'दुर्घटना' कहना मृतकों के साथ अन्याय होगा; इसे सीधे तौर पर 'हत्या' की श्रेणी में रखना चाहिए। पुलिस भले ही जांच का ढोंग करे, लेकिन असल गुनहगार वह रसूख है जिसने नियम-कायदों को आधी रात को बांधवगढ़ या उमरिया की सड़कों पर कुचल दिया।



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