पत्थरों से घायल बाघ... और सीएम का 'स्वागत': बांधवगढ़ में सिस्टम शर्मिंदा है!
बाघ पर बरसे पत्थरों का क्या हिसाब मांगेंगे CM मोहन यादव, या जश्न-ए-न्यू ईयर के शोर में दब जाएगी बेजुबानों की आह?
![]() |
| सीएम को गुलदस्ता भेंट करते बीटीआर के फील्ड डायरेक्टर |
इंट्रो: बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में इन दिनों 'जंगलराज' अपनी सीमाएं लांघ चुका है। कल पनपथा बफर जोन के बेल्दी गांव में सुरक्षा की ऐसी धज्जियां उड़ीं कि पूरी दुनिया में प्रदेश का सिर शर्म से झुक गया। अधिकारियों की मौजूदगी में राष्ट्रीय पशु बाघ पर सरेआम पत्थर बरसाए गए, नन्हे शावकों को जिप्सियों के पीछे असुरक्षित तरीके से दौड़ाया गया और पर्यटकों से जिप्सी में धक्के लगवाए गए। यह सब उस समय हुआ जब फील्ड डायरेक्टर अनुपम सहाय और डिप्टी डायरेक्टर पीके वर्मा मौके पर प्रशासनिक प्रबंधन का 'दम' भर रहे थे। आज जब मुख्यमंत्री मोहन यादव अपने परिवार के साथ नए साल का जश्न मनाने यहाँ पहुंचे हैं, तो प्रदेश की जनता उनसे यह उम्मीद लगाए बैठी है कि वे अफसरों के बनाए गए 'कागजी पर्दे' को हटाकर बेजुबानों का असली दर्द देखेंगे।
[ गजेन्द्र सिंह परिहार, विशेष संवाददाता]
शहडोल/उमरिया: बेल्दी गांव की वह दहला देने वाली घटना जिसमें बाघ को पत्थरों से मारा गया, आज पूरे सिस्टम की विफलता की गवाह बन गई है। ठीक इसी समय मुख्यमंत्री मोहन यादव बांधवगढ़ में मौजूद हैं। अब सवाल यह उठता है कि क्या यहाँ का पार्क प्रबंधन मुख्यमंत्री को उस हकीकत से रूबरू कराएगा जहां बाघ असुरक्षित हैं, या फिर उन्हें केवल विलासिता और 'टाइगर साइटिंग' के मायाजाल में उलझाकर वापस भेज दिया जाएगा? क्या मुख्यमंत्री जी उन पत्थरों की गूंज सुन पाएंगे जो बेजुबानों पर बरसाए गए, या अधिकारियों की खातिरदारी में यह गंभीर मामला कहीं दबा दिया जाएगा? जनता मुख्यमंत्री से यह अपील कर रही है कि वे अपनी इस यात्रा के दौरान उन बेजुबान बाघों का हाल भी जानें जो इस कुप्रबंधन की भेंट चढ़ रहे हैं।
*शिकायतों का अंबार और मेहमाननवाजी की ओट में छिपते सच*
बीते एक साल से बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व कुप्रबंधन और विवादों का केंद्र बना हुआ है। फील्ड डायरेक्टर अनुपम सहाय और उनकी टीम के खिलाफ शिकायतों का अंबार लगा है। प्रबंधन की मनमानी का आलम यह है कि स्थानीय विस्थापितों का हक मारकर रसूखदारों को गाइड पद पर नियुक्ति देने के लिए इंटरव्यू तक आयोजित कर लिए गए। डर इस बात का है कि कहीं मुख्यमंत्री को इन वास्तविक समस्याओं से दूर न रखा जाए। बेल्दी गांव की घटना ने सुरक्षा दावों की पोल खोल दी है, मगर आज वही अधिकारी जो इस लापरवाही के जिम्मेदार हैं, मुख्यमंत्री की सुरक्षा और सेवा में ढाल बनकर खड़े हैं। क्या मुख्यमंत्री जी इन 'खासमखास' अफसरों की कार्यशैली पर संज्ञान लेंगे? या फिर लापरवाह अधिकारी अपनी शानदार मेहमाननवाजी के पीछे बाघों की सिसकियों और स्थानीय लोगों के दर्द को छुपाने में कामयाब हो जाएंगे?
*टाइगर स्टेट की साख और नेतृत्व की अग्निपरीक्षा*
अंततः, यह मुख्यमंत्री मोहन यादव के सुशासन की परीक्षा है। प्रदेश के 'टाइगर स्टेट' का गौरव उन बेजुबान बाघों की सुरक्षा पर टिका है। उम्मीद है कि मुख्यमंत्री जी केवल सफारी और उत्सव तक सीमित न रहकर, बांधवगढ़ के इस बिगड़ते हालातों पर अपनी पैनी नजर डालेंगे। क्या वे उन अधिकारियों को जवाबदेह ठहराएंगे जिन्होंने बेल्दी गांव जैसी शर्मनाक घटनाओं को जन्म दिया, या फिर यह मामला भी एक 'सुहाने पर्यटन' की यादों के साथ दफन हो जाएगा? मुख्यमंत्री जी से प्रदेश को उम्मीद है कि वे जश्न के शोर के बीच उन बाघों का इंसाफ जरूर करेंगे।

















0 Comments