बाँधवगढ़ प्रबंधन की कुंभकर्णी नींद टूटी, नन्हें शावक के गुनहगारों की पहचान उजागर
क्यों हो रही वन्यजीव अपराधों की पुनरावृत्ति? रसूखदारों की गुलामी में बाँधवगढ़ प्रबंधन फिर घेरे में
उमरिया/शहडोल। विश्व प्रसिद्ध बाँधवगढ़ टाइगर रिज़र्व में रसूखदारों की सनक और नियमों की धज्जियां उड़ाने वाले भ्रष्ट तंत्र को आखिरकार जवाब देते नहीं बन रहा है। मीडिया हब शहडोल के संचालक गजेंद्र परिहार द्वारा 'कोबरा न्यूज डॉट कॉम' में प्रमुखता से प्रकाशित खबर 'नन्हें शावक के पीछे जिप्सी की दौड़' ने पार्क प्रशासन के गलियारों में ऐसा हड़कंप मचाया कि कल तक मौन साधे बैठे अधिकारी अब सफाई देने को मजबूर हैं। खबर के व्यापक प्रहार के बाद प्रबंधन ने उस शर्मनाक घटना को स्वीकार करते हुए आधिकारिक नोटिस जारी कर दिया है, जिसे अब तक रसूखदारों के दबाव में दबाने का पुरजोर प्रयास किया जा रहा था।
नोटिस के घेरे में लापरवाही
कार्यालय पर्यटन अधिकारी, ताला द्वारा जारी किए गए पत्र क्रमांक/612 के अनुसार, दिनांक 14.12.2025 की सुबह मगधी जोन में जो बर्बर कृत्य हुआ, उसने वन्यजीव संरक्षण के दावों के परखच्चे उड़ा दिए हैं। सरकारी नोटिस में साफ तौर पर दर्ज है कि वाहन क्रमांक MP54T1245 के चालक कमलेश सिंह और गाइड राजेश कुमार साहू (RN-179) ने अन्य पर्यटक वाहनों को जानबूझकर ओवरटेक किया और नन्हें बाघ का पीछा करके उसके प्राकृतिक विचरण में व्यवधान उत्पन्न किया। प्रबंधन ने स्वीकार किया है कि यह कृत्य न केवल पर्यटन नियमों का उल्लंघन है, बल्कि बेजुबान वन्यप्राणियों की सुरक्षा के साथ किया गया एक घिनौना खिलवाड़ है।
सिर्फ नोटिस ही क्यों? पुनरावृत्ति पर तीखे सवाल
हैरानी की बात यह है कि बाँधवगढ़ में इस तरह के वन्यजीव अपराधों की पुनरावृत्ति आए दिन क्यों हो रही है? क्या प्रबंधन की कार्रवाई केवल 'कारण बताओ नोटिस' और 'स्पष्टीकरण' की कागजी खानापूर्ति तक ही सीमित रहेगी? क्या यह महज एक ढोंग है ताकि रसूखदार पर्यटकों और उनके प्रभाव को आंच न आए? जब तक दोषियों पर ऐसी कठोर कार्रवाई नहीं होगी जो नजीर बने, तब तक जंगल के भीतर नियमों को कुचलने का यह खूनी खेल बंद नहीं होगा। 24 घंटे के भीतर जवाब माँगने का यह फरमान कहीं ठंडे बस्ते में जाने वाली एक और प्रशासनिक औपचारिकता तो नहीं?
सवालों के घेरे में नकारा प्रबंधन
बाँधवगढ़ में न केवल शावकों को दौड़ाने का मामला है, बल्कि पार्क प्रबंधन लगातार अपनी विफलताओं के चलते कठघरे में खड़ा है। यहाँ बाघों की लगातार होती संदिग्ध मौतें और घटती टाइगर साइटिंग ने सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है। इतना ही नहीं, सर्वोच्च न्यायालय के सख्त आदेशों को ठेंगा दिखाते हुए पार्क के भीतर मोबाइल फोन का धड़ल्ले से इस्तेमाल होना यह साबित करता है कि यहाँ अधिकारियों की मिलीभगत से 'जंगल राज' चल रहा है। जब देश की सबसे बड़ी अदालत के निर्देशों की धज्जियां उड़ाई जा रही हों, तो इन 'कुर्सी तोड़' अधिकारियों से बेजुबान बाघों के संरक्षण की उम्मीद करना बेमानी है।


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