वर्दीधारी लापरवाही की पराकाष्ठा: साक्ष्य मौजूद फिर भी जांच का ढोंग, पीके वर्मा के राज में पत्थरबाजों के आगे नतमस्तक हुआ प्रशासन!
मुख्यमंत्री का सत्कार और बाघों का संहार: फाइलों में दब गई बेल्दी की खूनी हकीकत, क्या अफसरों की 'शाही खातिरदारी' के आगे न्याय हार जाएगा?
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के पनपता बफर जोन के बेल्दी गांव में आठ दिन पहले जो ‘खूनी तमाशा’ हुआ, उसका फॉलोअप प्रबंधन की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। राष्ट्रीय पशु पर पत्थर और डंडे बरसते रहे और जिम्मेदार अधिकारी तमाशा देखते रहे, लेकिन एक सप्ताह से अधिक समय बीत जाने के बाद भी किसी पर कानूनी गाज नहीं गिरी। विडंबना देखिए कि इस घटना के महज एक दिन बाद मुख्यमंत्री मोहन यादव खुद अपने परिवार के साथ बांधवगढ़ में सफारी का आनंद ले रहे थे। कयास लगाए जा रहे थे कि सूबे के मुखिया और वन बल प्रमुख अंबाड़े बाघों के इस दर्द पर कड़ा संज्ञान लेंगे, लेकिन हकीकत यह है कि आज उस घायल बाघ को बिना किसी ठोस कार्रवाई के बाड़े से निकालकर दोबारा जंगल में छोड़ दिया गया। क्या प्रदेश के उच्चाधिकारियों के आश्वासनों के बीच भी न्याय की उम्मीद बेमानी है? गौर करने वाली बात यह भी है कि प्रदेश में बाघों की मौत का जो ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है, उसके पीछे बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व का यह लगातार जारी कुप्रबंधन भी कहीं न कहीं पूरी तरह जिम्मेदार है।
शहडोल/उमरिया। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व का प्रबंधन अब वन्यजीवों के लिए सुरक्षित बसेरा न रहकर लापरवाह अफसरों की ‘अय्याशी’ का केंद्र बन गया है। बेल्दी गांव की घटना के वीडियो साक्ष्य होने के बावजूद उप संचालक पीके वर्मा का अब तक ‘वीडियो देखने’ का बहाना बनाना उनके प्रशासनिक निकम्मेपन को उजागर करता है। जब एक जिम्मेदार अधिकारी की नाक के नीचे बाघ पर पत्थरों और डंडों की बारिश हो और बदले में केवल ‘समझाइश’ दी जाए, तो समझ लेना चाहिए कि पार्क का नियंत्रण अब विभाग के हाथ से निकलकर अराजक तत्वों के हाथ में जा चुका है। क्षेत्र संचालक अनुपम सहाय के संरक्षण में चल रही यह अफसरशाही बाघों के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गई है।
जांच या शाही मेहमान नवाजी?
बांधवगढ़ के इन बदतर हालातों के बीच एपीसीसीएफ कृष्णमूर्ति का दौरा अब सबसे बड़ी चर्चा का विषय है। सवाल यह उठाया जा रहा है कि क्या यह केवल एक रूटीन दौरा है या फिर वरिष्ठ अधिकारियों ने उन्हें जमीनी स्तर पर अंदरूनी जांच के लिए खास तौर पर भेजा है? क्या वे वाकई बेल्दी गांव की उस पत्थरबाजी, भर्ती घोटालों और प्रशासनिक कुप्रबंधन की तह तक जाएंगे, या फिर क्षेत्र संचालक और उप संचालक की ‘शाही मेहमान नवाजी’ का लुत्फ उठाकर वापस लौट जाएंगे? सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या एपीसीसीएफ कृष्णमूर्ति में इतनी हिम्मत है कि वे इस प्रशासनिक विफलता की सच्ची रिपोर्ट अपर मुख्य सचिव और वन बल प्रमुख तक पहुँचाएंगे?
मुख्यमंत्री की चुप्पी और अधिकारियों की मौज
बेल्दी की घटना के ठीक बाद मुख्यमंत्री मोहन यादव का आगमन हुआ था। उम्मीद थी कि जिस राज्य को ‘बाघ राज्य’ का गौरव प्राप्त है, उसका मुखिया अपने बाघों पर हुए इस हमले पर चुप्पी तोड़ेगा। लेकिन सफारी और विशिष्ट अतिथि सत्कार के बीच बाघों की चीखें दबकर रह गईं। मुख्यमंत्री की मौजूदगी में भी जब उप संचालक और क्षेत्र संचालक जैसे अधिकारी बेखौफ रहे, तो यह संकेत साफ है कि शासन स्तर पर वन्यजीव संरक्षण अब प्राथमिकता नहीं रहा। घायल बाघ को बिना किसी पारदर्शी स्वास्थ्य रिपोर्ट के आज जंगल में वापस छोड़ देना यह साबित करता है कि विभाग को केवल मुख्यमंत्री के दौरे की चकाचौंध से मतलब था, बाघ के जख्मों से नहीं।
लापरवाही और मौतों का सिलसिला
बांधवगढ़ में कुप्रबंधन का यह खेल नया नहीं है। उमरिया के ग्राम चंदिया में बाघ की मौत का मामला हो या पर्यटकों से जिप्सी में धक्का लगवाने की शर्मनाक तस्वीरें, पार्क प्रबंधन की साख बार-बार तार-तार हुई है। नन्हे बाघ सावक को जिप्सी से असुरक्षित तरीके से दौड़ाने की घटना ने पहले ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किरकिरी कराई थी, लेकिन जिम्मेदार अफसरों ने इससे कोई सबक नहीं लिया। विस्थापितों के हक पर डाका डालकर उन्हें हाशिए पर धकेलना और वन्यजीवों को पर्यटकों के मनोरंजन का खिलौना बना देना अब यहाँ की नई नियति बन चुकी है।
भर्ती घोटाला और रसूखदारों का कब्जा
उप संचालक पीके वर्मा के कार्यकाल में नियमों को ताक पर रखकर चहेतों को उपकृत करने का दौर जारी है। गाइड भर्ती में पारदर्शिता की कमी और रसूखदारों के चहेतों, रिजॉर्ट संचालकों के मैनेजरों व जिप्सी मालिकों को पिछले दरवाजे से नियुक्तियां देना विभाग की निष्पक्षता पर बड़ा सवाल है। जब स्थानीय युवाओं और विस्थापितों के अधिकारों को कुचलकर ‘खास लोगों’ को उपकृत किया जाएगा, तो वन्यजीव की सुरक्षा के प्रति संवेदनशीलता की उम्मीद करना बेमानी है। यही कारण है कि आज बेल्दी जैसी घटनाएं सरेआम हो रही हैं।

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