खाकी की मेहरबानी या रसूख की तानाशाही? डिप्टी रेंजर को मौत के मुहाने पर धकेलने वाले अफसरों के राज में वन्यजीव भी असुरक्षित!
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में कुप्रबंधन की दास्तान अब फाइलों से निकलकर मौत के कुएं तक पहुँच गई है, लेकिन अफसोस कि रक्षक को न्याय दिलाने वाली खाकी खुद सवालों के घेरे में है। पिछले दो दिनों से एंक्लोजर (बाड़े) से एक 8 माह का बाघ शावक संदिग्ध रूप से लापता है, जो सीधे तौर पर उन अधिकारियों की कार्यप्रणाली और नीयत पर सवाल खड़े करता है जिन्हें सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई थी। सबसे सनसनीखेज पहलू यह है कि इस शावक की सुरक्षा की कमान उन्हीं दोनों अधिकारियों एसडीओ दिलीप मराठा और रेंजर राहुल किरारकृके पास थी, जिन पर करीब 3 माह पूर्व एक डिप्टी रेंजर को आत्महत्या के लिए उकसाने के संगीन आरोप लगे थे। यह घटना साबित करती है कि बांधवगढ़ में रक्षक अपनी जान बचा रहे हैं और वन्यजीव सुरक्षित एंक्लोजर से गायब हो रहे हैं।
शहडोल/उमरिया। क्षेत्रीय गलियारों में यह चर्चा आम है कि बांधवगढ़ अब वन्यजीवों के संरक्षण के लिए नहीं, बल्कि अधिकारियों की तानाशाही और ‘सेटिंग’ के लिए जाना जा रहा है। इसी दागी नेतृत्व की निगरानी में बीते 48 घंटों में दो बाघों की मौत और अब शावक का संदिग्ध रूप से गायब होना यह साबित करता है कि साहबों की प्राथमिकता सुरक्षा नहीं, बल्कि वीआईपी टूरिज्म और होटल संचालकों के साथ तालमेल बिठाकर अपनी स्थिति मजबूत करना है। शहडोल मेडिकल कॉलेज में भर्ती पीड़ित के बयानों को टालना और उमरिया पुलिस की रहस्यमयी खामोशी यह बताने के लिए काफी है कि ऊपर से नीचे तक सब ने अपनी आँखें मूंद ली हैं।
प्रताड़ना का पुराना खिलाड़ी और सिस्टम की मजबूरी
एसडीओ दिलीप मराठा का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है, उनका अतीत अभद्रता और निलंबन की कहानियों से भरा पड़ा है। गढपुरी विस्थापन मामले में प्रताड़ना के कारण भोपाल अटैच होने वाले मराठा आखिर किस ‘जादुई जुगाड़’ से दोबारा ताला जैसी मलाईदार पोस्टिंग पर काबिज हो गए? यह सवाल बांधवगढ़ प्रबंधन की निष्पक्षता पर सवाल उठाता है। जब एक अधिकारी पहले ही दागी हो, तो उसे दोबारा वही ताकत देना यह दर्शाता है कि ऊपर बैठे ‘साहबों’ को कर्मचारियों की जान की कोई कीमत नहीं है। निलंबन के बाद भी व्यवहार न बदलना साफ करता है कि मराठा को कानून का नहीं, बल्कि अपने रसूख और उमरिया पुलिस के मौन समर्थन का पूरा भरोसा है।
लापता शावक और वीआईपी टूरिज्म की काली छाया
जिस तंत्र ने 3 माह पहले डिप्टी रेंजर को मरने की कोशिश करने पर मजबूर किया, उसी तंत्र की लापरवाही से आज बांधवगढ़ का एक भविष्य (शावक) दांव पर है। एंक्लोजर की सुरक्षा और सीसीटीवी की निगरानी के दावे खोखले साबित हो चुके हैं। चर्चा है कि जब एसडीओ और रेंजर होटल संचालकों और वीआईपी पर्यटकों की आवभगत की श्विशेष सेटिंगश् में मशगूल रहते हैं, तो सुरक्षा घेरा कमजोर होना तय है। 48 घंटे में दो बाघों की मौत और फिर शावक का गायब होना महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि कुप्रबंधन की वो पराकाष्ठा है जिसे विभाग और उमरिया पुलिस मिलकर दबाने की कोशिश कर रहे हैं।
क्या बयान बदलने का इंतज़ार कर रही है पुलिस?
साहब! जब रक्षक ही भक्षक की ढाल बन जाए, तो समझ लीजिए कि इंसाफ की बलि चढ़ चुकी है। उमरिया पुलिस की ‘रहमत’ ने यहाँ एक ऐसा ‘सेटिंग का साम्राज्य’ खड़ा कर दिया है जहाँ खाकी ही खाकी को बचाने में जुटी है। कानून कहता है कि पीड़ित का मृत्यु पूर्व कथन सबसे बड़ा साक्ष्य होता है, लेकिन पुलिस ने घायल डिप्टी रेंजर के तत्काल बयान लेने के बजाय उसके ठीक होने और बयान बदलने का इंतजार किया। सवाल यह है कि जो व्यक्ति रसूखदार अधिकारियों के खौफ से मौत के कुएं में कूद गया, क्या वह अब सुरक्षित होने के बाद उन्हीं अधिकारियों के दबाव में बयान नहीं बदलेगा? इसकी क्या गारंटी है कि अस्पताल के बिस्तर पर वह आजाद है? पुलिस की यह ‘रणनीति’ साफ इशारा करती है कि वे पीड़ित के टूटने और आरोपियों को ‘क्लीन चिट’ दिलाने का रास्ता साफ कर रहे हैं। क्या 3 माह से ठंडे बस्ते में पड़ा यह मामला सिर्फ इसलिए दबाया जा रहा है ताकि ‘खाकी-गठबंधन’ का रसूख बना रहे?
इनका कहना है
डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ला जी का आज बांधवगढ़ प्रवास कार्यक्रम है, जैसा कि पूर्व में मैंने बताया था कि मामले की जांच ताला चौकी प्रभारी द्वारा की जा रही थी चौकी प्रभारी वीरेंद्र यादव को उस समय जांच दी गई थी उसे जांच पर क्या हुआ यह मैं पता करके ही बता पाऊंगा। नवागत चौकी प्रभारी अमर बहादुर सिंह से जानकारी लेकर आपको अपडेट करता हूं।
मुकेश मर्सकोले
थाना प्रभारी, मानपुर जिला उमरिया





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