खबर के बाद भी कार्यवाही सिफर: क्या अतुल, रामजी और आदेश की कथित 'तिकड़ी' का नेटवर्क सिस्टम पर भारी? जबलपुर तक जुड़े तार, पुलिस की भूमिका संदेहास्पद
राजेंद्रग्राम में 'ओपन कसीनो' जैसा नजारा: कथित 'यादव' की सेटिंग और 'चचाई कनेक्शन' की चर्चा तेज; क्या 50 लाख की चमक के आगे धुंधली पड़ गई खाकी की साख?
शहडोल/अनूपपुर। अनूपपुर जिले के राजेंद्रग्राम थाना क्षेत्र में कानून का राज मानो माफियाओं की जेब में कैद होकर रह गया है। मीडिया में जुए के इस बड़े खेल की खबरें प्रमुखता से प्रकाशित होने के बाद भी राजेंद्रग्राम पुलिस की कार्यप्रणाली 'असहाय' और 'संदेहास्पद' प्रतीत हो रही है। हैरत की बात यह है कि पुलिसिया कार्यवाही के डर से फड़ बंद होना तो दूर, बल्कि सूत्रों का दावा है कि अब यहां जबलपुर तक के बड़े जुआरी अपनी किस्मत आजमाने पहुंचने लगे हैं। बताया जाता है कि इस पूरे खेल की बिसात अनूपपुर निवासी कथित अतुल और शहडोल निवासी रामजी व आदेश द्वारा बिछाई गई है। जिस तरह खबर छपने के बाद भी यह काला कारोबार और अधिक फल-फूल रहा है, उससे पुलिस कप्तान मोतीउर रहमान की साख और उनके 'जीरो टॉलरेंस' के दावे पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
10 दिन, 50 लाख की वसूली और 16 जिलों का नेटवर्क
राजेंद्रग्राम के जंगलों में सजे इस 'ओपन कसीनो' के अर्थशास्त्र ने सबको हिला कर रख दिया है। विश्वसनीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, फड़ से प्रतिदिन की नाल (कमीशन) वसूली लगभग 5 लाख रुपये बताई जा रही है। इस गणित से देखें तो पिछले 10 दिनों में यह सिंडिकेट करीब 50 लाख रुपये की काली कमाई डकार चुका है, ऐसी चर्चा जोरों पर है। बताया जाता है कि उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के 16 अलग-अलग जिलों से आए जुआरियों का यहां जमावड़ा लगा रहता है। दबी जुबान में लोग कह रहे हैं कि जंगल के भीतर ही शराब और शबाब का पूरा इंतजाम है। इतना बड़ा आयोजन और इतना भारी कैश फ्लो बिना स्थानीय पुलिस के कथित 'वरदहस्त' के संभव नहीं है। यह अब महज जुआ नहीं, बल्कि एक संगठित आर्थिक अपराध बन चुका है, जिसमें कई परिवारों की गाढ़ी कमाई स्वाहा हो रही है।
खबर के बाद भी 'ख़ामोशी': क्या मिलीभगत ही है वजह?
सबसे बड़ा और तीखा सवाल यह है कि मीडिया द्वारा इस अवैध कारोबार का भंडाफोड़ करने के बाद भी राजेंद्रग्राम पुलिस हरकत में क्यों नहीं आई? आम तौर पर खबर लगते ही पुलिस दबिश देती है, लेकिन यहाँ पसरा सन्नाटा इस जन चर्चा को बल दे रहा है कि कथित 'सेटिंग' का खेल बहुत ऊपर तक है। क्षेत्र में यह बात आम है कि एक कथित 'यादव' नामक बिचौलिए के माध्यम से 'प्रसाद' चढ़ाया जा रहा है, जिसके चलते पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी है। बताया जाता है कि चचाई के पुराने संपर्कों और रसूख का इस्तेमाल कर कथित संचालक—अनूपपुर के अतुल और शहडोल के रामजी व आदेश—ने कानून व्यवस्था को अपनी जागीर समझ लिया है।
जबलपुर तक के खिलाड़ियों की एंट्री और जंगल की आड़
सूत्रों का कहना है कि खबर छपने के बाद डरने के बजाय इस सिंडिकेट ने अपना दायरा और बढ़ा लिया है। अब इस फड़ में जबलपुर और महाकोशल क्षेत्र के बड़े जुआरियों के शामिल होने की भी खबरें छनकर आ रही हैं। संचालकों ने बेहद शातिर तरीके से राजेंद्रग्राम और बेनीबारी रोड के सीमावर्ती और दुर्गम वन क्षेत्रों को चुना है। 16 जिलों से आने वाली लग्जरी गाड़ियों की कतारें और जुआरियों की चहल-पहल जंगल की शांति भंग कर रही है, लेकिन पुलिस की पेट्रोलिंग गाड़ियों को शायद यह दिखाई नहीं देता। ऐसा प्रतीत होता है कि पुलिस का खुफिया तंत्र या तो पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है या फिर उसे 'गांधी जी के बंदरों' की तरह आंख, कान और मुंह बंद रखने की हिदायत दी गई है।
कप्तान साहब! अब तो जागिये, साख का सवाल है
लगातार ख़बरों के बाद भी कार्यवाही न होना सीधे तौर पर एसपी मोतीउर रहमान की कार्यशैली और नियंत्रण पर सवाल खड़े करता है। क्या जिले के कप्तान को उनके मातहत गुमराह कर रहे हैं? या फिर इस संगठित अपराध की जड़ें इतनी गहरी हैं कि उन्हें उखाड़ना मुश्किल हो रहा है? जनता की निगाहें अब कप्तान पर टिकी हैं कि वे अपने विभाग में छिपे 'विभीषणों' की पहचान कब करेंगे और राजेंद्रग्राम के जंगलों में चल रही इस 'लूट की दुकान' पर ताला कब जड़ेंगे। अनूपपुर के अतुल और शहडोल के रामजी-आदेश जैसे नामों पर कार्यवाही न होना पुलिसिया इकबाल के खत्म होने जैसा है।

0 Comments