पर्ची ने खोले प्रबंधन के राज,स्टाफ ने स्वीकारा आए दिन ऐसे ही होती है सफारी, मनमानी बन रही बाघों की मौत की वजह
शासन और NTCA के नियमों के विपरीत, अधिकार क्षेत्र से परे,आनलाइन सिस्टम को बायपास कर मैन्युअल पर्ची से टाइगर सुरक्षा में सेंध
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बांधवगढ़ से पलायन को मजबूर बाघ, शहडोल क्षेत्र पहुंचे दो बाघ की संदिग्ध मौत
बाघों की कब्रगाह बने बांधवगढ़ में 20 दिन में 5 मौतों और लाठीचार्ज के शोर के बीच अब ‘कालाबाजारी’ का बड़ा खेल उजागर हुआ है। एसआईटी की नाक के नीचे ताला जोन में ‘मैनुअल पर्ची’ से अवैध वसूली और वीआईपी सेटिंग का धंधा बेखौफ जारी है। वायरल पर्ची ने नियमों की धज्जियां उड़ा दी हैं। हद तो तब हो गई जब जिम्मेदार अधीनस्थ स्टाफ ने दबी जुबान में कबूला- ‘पर्यटन अधिकारी कार्यालय से ही ऐसी पर्चियां बनकर आती हैं, हमें तो बस उस पर अमल करना होता है।’ इस खुलासे ने वन विभाग के ‘भ्रष्टाचार’ की पोल खोलकर रख दी है।
शहडोल/उमरिया। वायरल हो रही यह पर्ची महज कागज का टुकड़ा नहीं, बल्कि वन विभाग के माथे पर लगा भ्रष्टाचार का वो दाग है जिसे मिटाना आसान नहीं होगा। यह पर्ची पूर्णतः अवैध है। एनटीसीए नई दिल्ली द्वारा जारी ‘नॉर्मेटिव स्टैंडर्ड्स फॉर टूरिज्म एक्टिविटीज, 2012’ में स्पष्ट उल्लेख है कि प्रत्येक टाइगर रिजर्व को अपनी ‘कैरिंग कैपेसिटी’ का कड़ाई से पालन करना होगा। इसके तहत वाहनों की संख्या सीमित और निर्धारित है। साथ ही, मध्य प्रदेश शासन के स्पष्ट आदेश हैं कि पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए बुकिंग केवल ‘कम्प्यूटरीकृत ऑनलाइन सिस्टम’ (एमपी ऑनलाइन/फॉरेस्ट पोर्टल) के माध्यम से ही होगी। मैनुअल पर्ची जारी करना सीधे तौर पर कैरिंग कैपेसिटी के नियम को तोड़ना है, जो कि वाइल्डलाइफ (प्रोटेक्शन) एक्ट, 1972 की धारा 38-ओ के तहत दंडनीय अपराध है।
स्टाफ ने खोली पोलः ‘‘साहब के ऑफिस से ही आती है पर्ची’’
इस पूरे मामले में ताला के पर्यटन अधिकारी (रेंज ऑफिसर) अंकित सोनी की भूमिका सवालों के घेरे में है। वायरल पर्ची पर उन्हीं की पदमुद्रा (सील) लगी है, लेकिन उनका कहना है कि ‘‘मैं इस पर्ची को नहीं जानता और इस पर मेरे सिग्नेचर नहीं हैं।’’ उनका यह पल्ला झाड़ना तब और भी संदिग्ध हो जाता है, जब उन्हीं के अधीनस्थ स्टाफ ने इस फर्जीवाड़े की कलई खोल दी। गेट पर तैनात और पर्ची प्रोसेस करने वाले स्टाफ ने साफ लफ्जों में कबूल किया है कि ‘‘यह कोई पहली बार नहीं है। ऐसी पर्चियां सीधे पर्यटन अधिकारी कार्यालय (ऑफिस) से ‘अलाऊ’ होकर आती हैं। जब साहब के ऑफिस से पर्ची आती है, तो हमें मजबूरी में उस पर साइन करना पड़ता है और गाड़ी छोड़नी पड़ती है। हम तो बस हुक्म के गुलाम हैं, विभाग के आगे हमारी क्या चलेगी?’’ स्टाफ का यह बयान साबित करता है कि अधिकारी झूठ बोल रहे हैं और यह पूरा सिंडिकेट उनकी नाक के नीचे चल रहा है।
पुष्टिः 1 फरवरी, 3 पर्यटक और अवैध एंट्री का सच
हमारी पड़ताल में इस वायरल पर्ची की एक-एक डिटेल की पुष्टि हो चुकी है। यह पर्ची जिप्सी क्रमांक एमपी-54-टी-1115 के लिए जारी की गई थी, जिसमें एक गाइड का नाम स्पष्ट रूप से उल्लेखित है। पर्ची पर ‘‘गाइड फी पेड 800’’ की मुहर लगाकर अवैध वसूली की गई। पुष्टि हुई है कि दिनांक 01 फरवरी 2026 को इसी फर्जी पर्ची के सहारे 3 पर्यटकों को ‘वीआईपी’ बताकर ताला जोन में अवैध सफारी कराई गई। बिना ऑनलाइन बुकिंग और बिना आईडी प्रूफ के इन तीन लोगों को सीधे गेट से अंदर भेजना सुरक्षा नियमों के मुंह पर तमाचा है। यह साबित करता है कि रजिस्टर में हेराफेरी कर पर्यटकों की संख्या छुपाई जा रही है।
वीआईपी ‘सेटिंग’ से सरकारी खजाने में सेंध
तथ्य यह है कि यह ‘मैनुअल पर्ची’ व्यवस्था की खामी नहीं, बल्कि एक सोची-समझी ‘कालाबाजारी’ है। पार्क में प्रवेश के लिए वाहनों की संख्या वैज्ञानिक आधार पर सीमित की गई है (कैरिंग कैपेसिटी)। लेकिन स्थानीय सूत्र बताते हैं कि जब ऑनलाइन कोटा फुल हो जाता है, तो ‘वीआईपी कल्चर’ और ‘सेटिंग’ के नाम पर इस तरह की फेक टीपी काटी जाती है। पर्यटकों से मुंहमांगी रकम वसूली जाती है, लेकिन चूँकि पर्ची मैनुअल है, इसलिए यह पैसा सरकारी खजाने (ट्रेजरी) में जमा नहीं होता। वायरल दस्तावेज इस बात का प्रमाण है कि यह ‘लूट’ लंबे समय से चल रही है और यह सिंडिकेट अधिकारियों की मिलीभगत के बिना संभव नहीं है।
अधिकारियों को मैनुअल पर्ची जारी करने का नहीं अधिकार
संवैधानिक और प्रशासनिक नियमों के तहत किसी भी फील्ड डायरेक्टर या पर्यटन अधिकारी को यह अधिकार नहीं है कि वे कोरे कागज पर मैनुअल पर्ची बनाकर किसी वाहन को प्रवेश दें। सुप्रीम कोर्ट और एनटीसीए के सख्त आदेश हैं कि ‘कैरिंग कैपेसिटी’ से एक भी गाड़ी ज्यादा नहीं जा सकती। यहां तक कि ‘विवेकाधीन कोटा’ (वीआईपी कोटा) भी केवल सिस्टम के जरिए ही जारी होता है, जिसका डिजिटल रिकॉर्ड और ट्रेजरी चालान अनिवार्य है। कोरे कागज पर मुहर लगाकर गाड़ी भेजना विशेषाधिकार नहीं, बल्कि ‘पद का दुरुपयोग’ और वित्तीय अनियमितता है। ऐसे में फील्ड डायरेक्टर की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। जब एसआईटी पार्क में मौजूद है, तब उनके अधीन ताला जोन में ऐसा ‘काला खेल’ चलना यह दर्शाता है कि या तो सिस्टम उनके हाथ से निकल चुका है या फिर इस अवैध वसूली में उनकी मौन सहमति है।
एफआईआर और निलंबन की दरकार
भ्रष्टाचार के इस मामले में केवल खानापूर्ति नहीं, बल्कि सख्त दंडात्मक कार्यवाही होनी चाहिए। वायरल पर्ची को साक्ष्य मानते हुए तत्काल प्रभाव से भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 318 (धोखाधड़ी) और धारा 336 (कूटरचना) के तहत आपराधिक मामला दर्ज हो (एफआईआर)। पर्यटन अधिकारी अंकित सोनी को तुरंत निलंबित किया जाए ताकि वे सबूतों से छेड़छाड़ न कर सकें और फील्ड डायरेक्टर की भूमिका की भी उच्च स्तरीय जांच हो। साथ ही, वाइल्डलाइफ (प्रोटेक्शन) एक्ट 1972 की धारा 51 के तहत विभागीय जांच बैठाकर यह पता लगाया जाए कि पिछले 6 महीने में शासन के राजस्व में कितनी सेंध लगाई गई है। यदि प्रशासन इस गंभीर मामले में तत्काल ठोस कार्रवाई नहीं करता, तो वन्यजीव प्रेमी और सामाजिक संस्थाएं उच्च न्यायालय (हाईकोर्ट) का दरवाजा खटखटाने को विवश होंगी। ऐसी चर्चा जोरों पर है कि न्याय के लिए जनहित याचिका (पीआईएल) भी दाखिल की जा सकती है।
लाठियों से भर्ती घोटाले तकः विवादों में बांधवगढ़
बांधवगढ़ प्रबंधन अब विवादों का पर्याय बन चुका है। बफर जोन में बाघ पर लाठियां बरसाने की घटना हो या 20 दिनों में 5 बाघों की रहस्यमय मौत, विभाग की साख तार-तार हो चुकी है। विस्थापितों का हक मारकर चहेतों की ‘गाइड भर्ती’ और तत्कालीन डिप्टी डायरेक्टर पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों ने पहले ही वन विभाग को कटघरे में खड़ा कर रखा है। इन तमाम काले कारनामों के बीच अब ‘मैनुअल पर्ची’ का फर्जीवाड़ा साबित करता है कि अधिकारी सुधरने के बजाय आपदा में भी लूट के नए रास्ते तलाश रहे हैं।
इनका कहना है
जानकारी आपके द्वारा संज्ञान में लाया गया है मै दिखवाता हूं, पर्ची देखने के बाद ही जांच अथवा कार्यवाही के विषय में कुछ बता पाउंगा।
अनुपम सहाय
फील्ड डायरेक्टर, बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व उमरिया
आपके द्वारा भेजी गई पर्ची में मेरे हस्ताक्षर नहीं है, मै इसका पता लगवा लेता हूं सील तो मेरी है लेकिन हस्ताक्षर मेरे नहीं है इसकी मुझे पूरी पुष्टि करनी पड़ेगी, मेरे संज्ञान में इस वर्ष कोई भी मेनुअल पर्ची जारी नहीं हुई है।
अंकित सोनी
पर्यटन अधिकारी, बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व उमरिया




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