विभागीय जांच या 'आपराधिक प्रकरण' से बचाने का फंडा? BNS की धाराओं में मुकदमा क्यों नहीं, बिना न्याय मिले बहाली पर सवाल!
सुसाइड, सस्पेंशन और जिला बदल: मानवाधिकार आयोग तक गूंजेगी फाइल, क्या खाकी की साख बचाने दबी हत्या के उकसावे की रिपोर्ट?
(गजेंद्र सिंह परिहार की कलम से..)
शहडोल/अनूपपुर : कोतमा थाने में पुजारी रामेश्वर पांडे की आत्महत्या का मामला भले ही न्यायालय की शरण में है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि "विभाग का मूल दोषी" आज भी वर्दी की आड़ में सुरक्षित क्यों है? जब तत्कालीन जांच में थाना प्रभारी अजय कुमार बैगा को दोषी मानते हुए सस्पेंड किया गया था, तो विभागीय स्तर पर उन्हें 'क्लीन चिट' देकर दोबारा फील्ड पोस्टिंग कैसे मिल गई? अब सामाजिक न्याय की गुहार लगाते हुए इस मामले की फाइल को दोबारा खोलने की तैयारी कर ली गई है और तुरंत उच्च स्तरीय जांच की मांग उठ रही है।
संवेदनशील आईजी से आस: समीक्षा के बाद दर्ज हो मुकदमा
शहडोल रेंज के नवागत आईजी और प्रदेश के संवेदनशील डीजीपी से जनता और पीड़ित परिवार यह उम्मीद लगाए बैठा है कि वे इस मामले में 'सिवनी ' हवाला कांड' की तरह ही निष्पक्षता दिखाएंगे। उस मामले में पुलिस ने अपने ही एसडीओपी और टीआई को जेल भेजकर नजीर पेश की थी। उम्मीद है कि पुलिस आलाकमान मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए तत्कालीन विभागीय जांच की पूरी समीक्षा करेंगे। बताया जाता है कि अगर सही से जांच हुई, तो जो पुलिसकर्मी दोषी पाए जाएंगे, उन पर हत्या के उकसावे का मुकदमा दर्ज होगा। न्याय पुलिस की चौखट पर दम नहीं तोड़ेगा।
तत्कालीन समय में एसपी ने किया था सस्पेंड, फिर 'बहाल' कैसे?
यह पूरा घटनाक्रम तत्कालीन समय का है, जब घटना के बाद एडीजीपी डीसी सागर ने निरीक्षण किया था। उस वक्त एडीजीपी के निर्देश पर तत्कालीन पुलिस अधीक्षक (SP) जितेंद्र सिंह पवार ने त्वरित कार्रवाई करते हुए थाना प्रभारी अजय कुमार बैगा को तत्काल प्रभाव से निलंबित (Suspend) कर दिया था।
लेकिन आज सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि आखिर निलंबन के बाद ऐसी क्या विभागीय प्रक्रिया हुई कि दागी अधिकारी को न केवल बहाल (Reinstated) कर दिया गया, बल्कि उन्हें दोबारा थाने की कमान सौंप दी गई? यह 'बहाली' विभाग की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाती है।
इन धाराओं में 'दोषी' होने का अंदेशा
मीडिया रिपोर्ट्स और तत्कालीन जांच के निष्कर्षों की मानें तो, टीआई अजय बैगा और स्टाफ पर इन धाराओं में एफआईआर दर्ज होनी चाहिए थी, जो कथित तौर पर नहीं हुई:
- धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना): बताया जाता है कि प्रताड़ना, अपमान और कथित तौर पर 1 लाख की घूस मांगकर जान देने पर मजबूर किया गया।
- धारा 342/348 (अवैध हिरासत): बिना एफआईआर 12 घंटे लॉकअप में कैद रखने की बात जांच में सामने आई थी।
- धारा 384 (जबरन वसूली/एक्सटॉर्शन): वर्दी का रौब दिखाकर 50 हजार रुपये मांगने का आरोप परिजनों ने लगाया था।
- धारा 166-A (कानून की अवज्ञा): सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के खिलाफ रात में महिला का मेडिकल कराने का मामला पकड़ा गया था।
- धारा 294/500 (मानहानि): पुजारी को अर्धनग्न (कपड़े उतरवाकर) करने की शर्मनाक घटना की पुष्टि हुई थी।
पुलिस ने अपनी ही विभाग की काली भेड़ों को बचाने के लिए जिस तरह मामले की लीपापोती की, उसे देखते हुए अब स्थानीय पुलिस जांच पर से भरोसा उठ चुका है। सामाजिक संगठनों ने अब इस पूरे प्रकरण की सीबीआई (CBI) अथवा न्यायिक मजिस्ट्रेट जांच की मांग बुलंद कर दी है। मांग साफ है कि मामला मानवाधिकार आयोग (भोपाल) और अन्य उच्च स्तरीय स्थानों पर भी भेजा जाएगा ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।
एडीजीपी डीसी सागर को मिले थे सबूत
बताया जाता है कि तत्कालीन एडीजीपी डीसी सागर ने जब थाने का निरीक्षण किया था, तो उन्होंने तीन गंभीर अपराध पकड़े थे:
- रजिस्टर में बिना एफआईआर दर्ज किए पुजारी को अवैध हिरासत में रखा गया।
- नियमों को ताक पर रखकर रात के अंधेरे में महिला का मेडिकल कराया गया।
- थाने में अनुशासनहीनता और वर्दी का अपमान पाया गया।
जयसिंहनगर से हटाए जाएं टीआई
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस अधिकारी पर 'कस्टोडियल टॉर्चर' का दाग है, उसे जयसिंहनगर जैसे अति-संवेदनशील आदिवासी अंचल में थाना प्रभारी कैसे बना दिया गया? क्या विभाग आदिवासियों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ कर रहा है? प्रशासन से अपेक्षा है कि जब तक सीबीआई या मजिस्ट्रेट जांच पूरी नहीं होती और फाइल दोबारा नहीं खुलती, तब तक टीआई अजय बैगा को तत्काल प्रभाव से हटाया जाए।


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